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साहित्य संगम मंच पर गणतंत्र दिवस विशेष काव्य गोष्ठी — शब्दों में सजी राष्ट्रचेतना

साहित्य संगम मंच के तत्वावधान में गणतंत्र दिवस के पावन अवसर पर आयोजित यह काव्य गोष्ठी केवल एक साहित्यिक आयोजन नहीं, बल्कि संविधान, राष्ट्र और मानवीय मूल्यों के प्रति सामूहिक नमन की एक भावपूर्ण यात्रा थी। शब्दों ने यहाँ राष्ट्रधर्म का रूप लिया और कविता संविधान की आत्मा बनकर मुखर हुई।
कार्यक्रम का शुभारंभ मंच की कुशल संचालिका शिखा खुराना द्वारा अत्यंत गरिमामयी स्वागत वक्तव्य से हुआ। आपने आदरणीया मुख्य अतिथि रीमा सिन्हा जी का साहित्यिक, पत्रकारिता एवं सामाजिक योगदानों से सुसज्जित परिचय प्रस्तुत करते हुए उनकी सृजन यात्रा और उपलब्धियों को प्रभावशाली शब्दों में रेखांकित किया। गोष्ठी की अध्यक्षता आदरणीया सुनीता तिवारी जी ने की, जिनकी उपस्थिति ने आयोजन को वैचारिक ऊँचाई प्रदान की।
कार्यक्रम का मंगलारंभ आदरणीया सुषमा मेहरोत्रा जी की सुमधुर सरस्वती वंदना से हुआ—
“मां शारदे, मां शारदे, निज चरणों में स्थान दे…”
जिससे संपूर्ण वातावरण भक्तिरस और सृजनात्मक ऊर्जा से भर उठा।
इसके पश्चात राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत रचनाओं की अविरल धारा प्रवाहित हुई—
आदरणीया सीमा पुरबा ‘सिम्मी’ जी ने ओजस्वी स्वर में
“नमन तुम्हें, हे वीर बांकुरों…”
कहकर वीर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की।
डॉ. कौशलेंद्र चतुर्वेदी जी ने तिरंगे के गौरव को शब्दों में पिरोते हुए कहा—
“नमन हूँ करता भारत को मैं, लिए तिरंगा हाथ में…”
उनकी रचना राष्ट्र के स्वाभिमान की सशक्त अभिव्यक्ति बनी।
आदरणीय ललित कुमार शर्मा जी ने “पहलगाम एक ललकार” जैसी ओजपूर्ण कविता से श्रोताओं को झकझोर दिया—
“धर्म पूछकर मारा था जाकर…”
साथ ही नववर्ष पर तरन्नुम में प्रस्तुत गीत ने भावों को और विस्तार दिया।
आदरणीया पूनम भारद्वाज जी ने आत्ममंथन का संदेश देती हुई सजल प्रस्तुति दी—
“नहीं यह पर्व है केवल, यह अवसर आत्मचिंतन का…”
आदरणीया अंजू मलिक जी की रचना—
“मैं भारत की बेटी हूँ…”
नारी चेतना और राष्ट्रप्रेम का सुंदर संगम बनी।
पुनः सुषमा मेहरोत्रा जी ने
“अतुल्य भारत, अग्रणी भारत…”
के माध्यम से मातृभूमि के प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित की।

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आदरणीया ऋतु कुमारी जी ने बसंत ऋतु पर आधारित सरस प्रस्तुति से वातावरण को कोमल भावों से भर दिया—
“सरसों, कोयल, हवा में मधुरस…”
मधु वशिष्ठ जी ने नवभारत के निर्माण का आह्वान करते हुए कहा—
“चलो एक नवनिर्माण किया जाए…”
आदरणीया अलका गर्ग जी की ग़ज़ल—
“हाथ ऊपर उठ गए उनकी इबादत के लिए…”
शहादत के प्रति गहरी संवेदना का स्वर बनी।
इसके पश्चात अध्यक्षा सुनीता तिवारी जी ने अपनी प्रभावशाली प्रस्तुति से गोष्ठी को गरिमा प्रदान की—
“घर के आँगन लहराए तिरंगा…”

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कार्यक्रम में मृत्युंजय झा जी की प्रस्तुति विशेष रूप से हृदयस्पर्शी रही, जिसमें एक शहीद के बाद उसकी माँ, पत्नी और बच्चों के दर्द का मार्मिक चित्रण था—पूरा सभागार भावुक हो उठा।
मुख्य अतिथि आदरणीया रीमा सिन्हा जी ने सभी रचनाकारों की रचनाओं पर सारगर्भित, प्रेरणादायी समीक्षाएँ प्रस्तुत कीं और अंत में अपनी अत्यंत मार्मिक रचना—
“विधवा कहो या वीरवधू…”
से समस्त श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। क्षणभर को सभागार निस्तब्ध हो गया।
समापन अवसर पर शिखा खुराना द्वारा प्रस्तुत “गणतंत्र का उजास” कविता ने पूरे आयोजन को वैचारिक पूर्णता दी—
यह रचना लोकतंत्र, संविधान, कर्तव्य और मानवीय गरिमा का घोषपत्र बनकर उभरी।
अंततः साहित्य संगम मंच की यह गणतंत्र दिवस विशेष काव्य गोष्ठी राष्ट्र, संविधान और संवेदना के प्रति एक सशक्त साहित्यिक संकल्प बनकर सफलतापूर्वक संपन्न हुई।
जय हिंद 🇮🇳 | वंदे मातरम्

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