अनजान परछाइयाँ/उपन्यास — सुनीता तिवारी”सरस”

शहर भोपाल की शाम हमेशा की तरह शांत थी, पर उस दिन हवा में कुछ अजीब-सी खामोशी थी। पुरानी इमारतों के बीच खड़ी आराध्या को बार-बार लग रहा था कि कोई उसका पीछा कर रहा है।
वह एक युवा पत्रकार थी,सच को उजागर करना ही उसका जुनून था।
पिछले कुछ दिनों से वह नगर निगम की एक गुप्त फाइल पर काम कर रही थी।
फाइल में करोड़ों के घोटाले के संकेत थे, जिनमें बड़े नाम शामिल हो सकते थे।
उसी रात उसके मोबाइल पर एक अनजान संदेश आया
“सच जानना चाहती हो तो कल पुराने पुस्तकालय में मिलो।
अकेली आना।”
आराध्या का दिल तेज़ धड़कने लगा।
क्या यह कोई जाल था?
या सच तक पहुँचने का एकमात्र रास्ता?
अगले दिन वह तय समय पर पहुँची।
पुस्तकालय की टूटी खिड़कियों से आती धूप में धूल तैर रही थी।
अचानक पीछे से आवाज़ आई
“तुम बहुत आगे बढ़ चुकी हो।”
वह मुड़ी।
सामने उसके ही दफ़्तर का सहयोगी विवेक खड़ा था।
“तुम?”
विवेक ने धीमे स्वर में कहा, “जिस घोटाले की जाँच तुम कर रही हो, उसमें कुछ ऐसे लोग हैं जो सच सामने नहीं आने देंगे।
यह सिर्फ पैसों का मामला नहीं, सत्ता की साज़िश है।”
उसने एक पेनड्राइव उसकी ओर बढ़ाई।
“इसमें सबूत हैं।
लेकिन सावधान रहना
तुम पर नज़र रखी जा रही है।”
आराध्या ने जैसे ही रिपोर्ट तैयार की, उसके लैपटॉप से सारे डेटा गायब हो गए। ऑफिस में खबर फैल गई कि उसने झूठी जानकारी गढ़ी है।
कौन था गद्दार?
क्या विवेक सचमुच मदद कर रहा था या वही साज़िश का हिस्सा था?
सच और झूठ की इस जंग में आराध्या अकेली पड़ती जा रही थी।
सुनीता तिवारी”सरस”




