Uncategorized

दोष सरकार का या ठेकेदार का? — ओम कुमावत

आज देशभर में सड़कों, नालियों और पानी की टंकियों की खराब हालत को लेकर जनता में भारी आक्रोश है। गड्ढों से भरी सड़कें, जाम नालियाँ और कुछ ही महीनों में टूट जाने वाले निर्माण कार्य आम बात बन चुके हैं। लेकिन इस पूरी व्यवस्था में एक बड़ा सवाल अनदेखा रह जाता है—असल दोषी कौन है? अधिकांश मामलों में सरकार इन कार्यों के लिए पूरा बजट स्वीकृत करती है। सड़क, नाली या टंकी बनाने के लिए जितना पैसा तय होता है, वह सरकारी रिकॉर्ड में खर्च भी दिखाया जाता है। इसके बावजूद निर्माण की गुणवत्ता बेहद घटिया क्यों होती है? इसका सीधा उत्तर है—भ्रष्ट ठेकेदारी व्यवस्था और सिस्टम की लापरवाही। सरकारी कार्य करने वाले अनेक ठेकेदार लागत का पूरा पैसा काम में नहीं लगाते। 100 रुपये के काम में 10–20 रुपये की सामग्री लगाकर, शेष रकम फर्जी बिलों और कागज़ी प्रक्रियाओं के ज़रिये हज़म कर ली जाती है। नतीजा यह होता है कि सड़क कुछ ही दिनों में उखड़ जाती है, नालियाँ टूट जाती हैं और जनता को परेशानी झेलनी पड़ती है। विडंबना यह है कि 98 प्रतिशत जनता को यह तक पता नहीं होता कि उनके क्षेत्र की सड़क या नाली किस ठेकेदार ने बनाई है। इसलिए गुस्सा सीधे सरकार पर निकलता है। चाहे सरकार किसी भी पार्टी की हो—बीजेपी या कांग्रेस—उंगली उसी पर उठती है, जबकि ज़मीनी स्तर पर भ्रष्टाचार अक्सर ठेकेदार द्वारा किया जाता है।यह समस्या केवल आरोप लगाने से हल नहीं होगी। इसके लिए एक पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था की आवश्यकता है। सरकार को एक ऐसा सार्वजनिक पोर्टल या मोबाइल ऐप बनाना चाहिए, जिसमें सभी सरकारी पंजीकृत ठेकेदारों की प्रोफ़ाइल उपलब्ध हो। उस पोर्टल पर यह स्पष्ट दर्ज हो कि किस ठेकेदार ने कौन-सा सड़क, नाली, टंकी या अन्य निर्माण कार्य किया है। हर परियोजना का एक अलग पेज हो, जहाँ आम जनता उस काम की गुणवत्ता के आधार पर रेटिंग और प्रतिक्रिया दे सके। इससे जनता बिना वजह सरकार को कोसने के बजाय सीधे संबंधित ठेकेदार के काम पर अपनी राय रख सकेगी। इसके साथ-साथ उस पोर्टल पर आगामी परियोजनाओं की जानकारी भी सार्वजनिक की जानी चाहिए।
किस क्षेत्र में किस सड़क का निर्माण होना है, सड़क कहाँ से कहाँ तक बनेगी, किस ठेकेदार को वह काम आवंटित हुआ है और उस परियोजना का कुल बजट कितना है—यह सारी जानकारी पहले से उपलब्ध हो। इससे जनता निर्माण कार्य के दौरान ही निगरानी कर सकेगी और गड़बड़ी की आशंका कम होगी।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भविष्य में जब किसी नए टेंडर को मंज़ूरी दी जाए, तो उस ठेकेदार की पिछली रेटिंग, रिकॉर्ड और जनता की प्रतिक्रिया को भी अनिवार्य रूप से ध्यान में रखा जाए। खराब रिकॉर्ड वाले ठेकेदारों को बाहर किया जाए और अच्छा काम करने वालों को प्रोत्साहित किया जाए। जब तक ठेकेदारों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक विकास कार्यों की गुणवत्ता सिर्फ काग़ज़ों में ही बेहतर रहेगी।
सड़कें तभी मज़बूत बनेंगी, जब व्यवस्था भी उतनी ही मज़बूत होगी। – — ओम कुमावत

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!