होनहार प्रतिभा सुलभ न्याय — विनोद कुमार शर्मा

अर्थव चतुर्वेदी उम्र सिर्फ उन्नीस वर्ष 530/800 दो बार नीट निकलने के बाद भी EWS कोटे से तंत्र सिस्टम की लापरवाही के कारण दाखिला नहीं मिल पाया
उच्च न्यायालय ने विना वकील अपनी ओर से याचिका को सुनने के बाद असमर्थता जताई और साहसी नवयुवक को डॉक्टर बनने के बजाय एडवोकेट बनने के लिए कानून की पढ़ाई करने पर विचार करने को प्रोत्साहित किया आगे उच्चतम न्यायालय का रुख करता वहां तीन जजों की खंडपीठ के सामने बिना वकील के वहां भी स्वंम अपनी पैरवी कर अपनी दलीलों से सिर्फ 🔟 मिनट में माननीय उच्चतम न्यायालय को अनुच्छेद 142 का उपयोग कर उसको राहत देते हुए दाखिले का आदेश देता और एसे कालेजों में ताला लगाने की बात कहता जो कानूनों के अनुसार कोटे की सीटों को बेचकर सिस्टम का मज़ाक बनाते
बात यहीं खत्म नहीं होती कानून का सम्मान और बहादुरी की प्रशंसा करने बाले आलोचना शुरू करते और EWS कोटे मैं फ़र्जी बाड़ा बताते कहते जिसके पास पराईबेट मेडीकल कालेज की फीस भरने के पैसे हों वो EWS में कैसे हो सकता l
जबकि उस नौ युवक ने सोये समाज सिस्टम और कानून को झकझोर कर रख दिया प्रेस मीडिया एसी बातों को बहुत कवरेज भी नहीं देना चाहती
मुख्यतः आज के दौर में सवर्ण होना अपराध करने या विना अपराध के अपराधी होने जैसा मान लेने का दौर आ गया या ला दिया गया दूसरा अपना हक भी बिना लड़े नहीं पाया जा सकता तीसरा सुप्रीम कोर्ट की करनी और कथनी में भेद आज नहीं नजर आता जैसा अपने भगवान से कहो अपनी मूर्ति स्वंम बना लें का दौर था आज जैसा कहा गया न्याय के दरवाजे आम आदमी के लिए खुले वैसा माननीय उच्चतम न्यायालय ने कर दिखाया l
एक अन्य प्रखर प्रतिभा आरक्षण की भेदभाव की दीवारों को चीरकर श्रेयस मिश्रा JEE मैंस mains मैं टोपर #100% लाकर बधाइयाँ बधाइयों के हकदार बने l
विनोद कुमार शर्मा



