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लघुकथा _चौखट के उस पार  — सपना बबेले

 

बरसों से उस पुराने बस स्टैंड की टूटी बेंच पर एक औरत बैठी दिखाई देती थी। सिर पर फीकी पड़ी साड़ी, हाथ में एक पुराना थैला और आँखों में किसी अनजाने इंतजार की नमी। लोग उसे बेसहारा कहकर आगे बढ़ जाते।
कभी उसका भी घर था चौखट, आँगन, चूल्हे की आँच और दीवारों पर टंगे सपने। पति के जाने के बाद रिश्तेदारों ने सहानुभूति के दो शब्द दिए, फिर घर के कागज अपने नाम करा लिए। वह चौखट, जिसे उसने सहेजा था, एक दिन उसके लिए ही पराई हो गई।
पहले पहले उसने बहुत रोया, फिर आँसू भी जैसे उससे किनारा कर गए। उसने पास के मंदिर में फूल बेचने शुरू कर दिए। सुबह की ठंडी हवा में वह अपनी सूनी मांग छुपाकर मुस्कुराने की कोशिश करती। कोई फूल लेता, कोई नहीं ,पर वह हर किसी को भगवान भला करे कहती।
एक दिन बस स्टैंड पर बैठी एक छोटी बच्ची उसके पास आई। फटे कपड़े, डरी हुई आँखें।
मेरी माँ नहीं है मुझे भूख लगी है,बच्ची ने धीरे से कहा।
उस औरत ने पहली बार अपने थैले से सूखी रोटी निकाली और बच्ची को दे दी। फिर उसके बाल सहलाते हुए बोली, अब है।
उस दिन से बस स्टैंड की वह बेंच दो लोगों की हो गई। लोग अब भी उसे बेसहारा कहते थे, पर सच तो यह था जिसने किसी और को सहारा दे दिया, वह खुद बेसहारा कहाँ रही।
चौखट उसके हिस्से नहीं आई, पर उसने आसमान को ही अपना घर बना लिया।

सपना बबेले स्वरा

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