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सोशल साइट्स का विद्यार्थी जीवन पर प्रभाव  — प्रवीणा सिंह राणा प्रदन्या

 

आज के डिजिटल युग में सोशल साइट्स विद्यार्थियों के जीवन का अभिन्न अंग बन चुकी हैं। फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, व्हाट्सऐप, और कई अन्य प्लेटफ़ॉर्म मनोरंजन, जानकारी और संवाद के आसान साधन प्रदान करते हैं। परंतु इनका अनियंत्रित उपयोग धीरे-धीरे विद्यार्थियों के लिए घातक सिद्ध हो रहा है। जिस तकनीक का निर्माण ज्ञान-विस्तार व सुविधा के लिए हुआ था, वही आज उनके मानसिक, शैक्षणिक और सामाजिक जीवन पर नकारात्मक प्रभाव डाल रही है।

सबसे पहले इसका प्रभाव पढ़ाई पर दिखाई देता है। सोशल साइट्स पर घंटों स्क्रॉल करते हुए विद्यार्थी अपना मूल्यवान समय गँवा देते हैं। परिणामस्वरूप उनकी एकाग्रता कमजोर होती है, स्मरणशक्ति पर असर पड़ता है और परीक्षा-प्रदर्शन गिरने लगता है। पढ़ाई के समय बार-बार आने वाली नोटिफ़िकेशन एक बड़ा व्यवधान बन जाती हैं। इससे न केवल उनका ध्यान बंटता है, बल्कि अध्ययन में निरंतरता भी टूट जाती है।

दूसरा दुष्प्रभाव मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। लाइक्स और फॉलोअर्स पाने की होड़ विद्यार्थियों में हीनभावना, चिंता और अवसाद बढ़ा रही है। दूसरों से अपनी तुलना करना उनकी आत्मविश्वास को कम कर देता है। कई बार ट्रोलिंग, साइबर बुलिंग और फेक अकाउंट्स का सामना भी करना पड़ता है, जो मानसिक शांति छीन लेते हैं।

तीसरा खतरा सामाजिक व्यवहार पर दिखाई देता है। वास्तविक जीवन के रिश्तों से दूरी बढ़ती जा रही है। विद्यार्थी अधिक समय वर्चुअल दुनिया में बिताते हैं, जिससे संवाद कौशल, सहानुभूति और सामाजिक सहभागिता कमजोर पड़ती है। परिवार और मित्रों से संवाद कम हो जाना उनके व्यक्तित्व विकास में बाधा बनता है।

इन सबके बावजूद सोशल साइट्स स्वयं बुरी नहीं हैं, बल्कि उनका गलत और अत्यधिक उपयोग हानिकारक है। अतः विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है कि वे इनका सीमित, संयमित और उद्देश्यपूर्ण उपयोग करें। अभिभावक और शिक्षक भी डिजिटल अनुशासन की आदत विकसित करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

अंततः कहा जा सकता है कि यदि सोशल साइट्स पर नियंत्रण नहीं रखा गया, तो ये विद्यार्थियों के भविष्य के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं। समय की माँग है कि तकनीक के साथ संतुलन बनाकर अध्ययन और जीवन दोनों को नई दिशा दी जाए।

स्वरचित मौलिक
प्रवीणा सिंह राणा प्रदन्या

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