Uncategorized

संक्षिप्त लेख : खुद को बदलो — पालजीभाई वी राठोड़ ‘प्रेम’

 

खुद को बदल लो या वक्त को क्योंकि हर समय मजबूरियों का वास्ता देना या क़िस्मत को कोसना अच्छा नहीं होता जीवन में चलना तो है ही तो मुस्कुरा कर चलो मिसाल बन कर चलो यही जीवन है।सम्मान या इज्जत कभी माँगने से नहीं मिलती बाँटने से मिलती है प्यार कभी माँगने से नहीं मिलता आप जितना दोगे उतना मिलेगा सुख दुःख क्रोध ईर्ष्या खुशी जितनी बाँटोगे उतनी वापस मिलेगी ये प्रकृति का नियम है तो अच्छा बाँटो।हर रिश्ता कुछ न कुछ सिखाने आता है किसी से सब्र मिल जाता है तो किसी से सबक इस लिए किसी से शिकायत मत करो हर कोई अपने कर्म और भूमिका में सही है बस सीखते रहो,बढते रहो क्योंकि जीवन अनुभवों से ही सुन्दर बनता है।
इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन वो खुद होता है खुद अपने अंदर क्रोध,लोभ,लालच,अभिमान, ईर्ष्या,भेदभाव आदि को रखता है दूसरों के अंदर झाँकता रहता है और दूसरों को शत्रु समझता है उनकी कमियाँ देखता है जबकि खुद को देखना ज्यादा जरूरी है।दिमाग ठंडा हो तो फैसले गलत नहीं होते और भाषा मीठी हो तो अपने दूर नहीं होते जीवन में जब भी उलझनें बढ़ने लगें तो खुद को थोडा ढील दें क्योंकी गांठ को खोलने का यही तरीका सबसे अच्छा होता है जिसके साथ बात करने से ही खुशी दोगुनी और दुःख आधा हो जाए वो ही अपना है।हालात सीखा देते है जीने का हुनर, फिर क्या लकीरें और क्या मुकद्दर। हमारा मन ही दोस्त है मन ही दुश्मन सभी विचार मन में आते हैं और उनपर अमल करने से हमारे कर्म बनते हैं कर्म व्यक्तित्व की पहचान बनते हैं और व्यक्तित्व ऐसा होना चाहिए की जिस जगह से जाओ लोग याद करें और जहाँ जा रहे हो वहाँ सब आपका दिल से इंतजार करें।हारता हुआ इंसान भी जीत सकता है चाहें खेल का मैदान हो युद्ध का मैदान या जीवन के रास्ते लेकिन मन से हारा हुआ इंसान कभी नहीं जीत सकता इसलिए मन को मत हारने दो। जो अच्छा लगे वह ग्रहण करो जो बुरा लगे उसका त्याग करो चाहे वह धर्म हो या कर्म हो मनुष्य हो या फिर विचार हो।सबसे मुश्किल काम है, समेटना फिर चाहें वो बातें हो‌‌ रिश्ते हों या फिर बिखरा हुआ घर हो।अचानक से रिश्तों की नींव नहीं हिलती हिलती तब है ज़ब कोई अपने हिस्से की ईट खींच लेता है। जींदगी वन-डे मैच की तरह है जिसमें रन तो बढ़ रहे है पर ओवर घट रहे है मतलब धन तो बढ़ रहा है पर उम्र घट रही है इसलिए हर दिन कुछ न कुछ पूण्य के चौके छक्के लगायें ताकि ऊपर बैठा एम्पायर हमें खुशियों की ट्रॉफी दे। शब्द भी एक भोजन हैं बोलने से पहले चख लिजिए स्वयं को अगर अच्छा ना लगे तो दुसरों को मत परोसिए।हमारी जीभ या हमारी बोली ही हमें मान सम्मान दिलाती है सफलता और असफलता का भी कारण बनती है रिश्तों को तोड़ने और जोड़ने का काम भी यही करती है दुनिया में हमारी अच्छी या बुरी छवि का कारण भी यही होती है इसलिए वाणी को वीणा के तारों की तरह मधुर और प्रभावित करने वाली रखो।शीशा और रिश्ता दोनों ही बडे़ नाजुक होते हैं दोनों में सिर्फ एक ही फर्क है शीशा गलती से टूट जाता है और रिश्ता गलतफहमियों से टूट जाता है।वक्त और हालात जब बदलते हैं तो इंसान अपने शौक बदल लेता है जीने के तरीके बदल लेता है लेकिन कुछ रिश्ते और दोस्त अपने आप ही बदल जाते हैं।दूसरों का दुःख देखकर जिसका दिल दुखता है सच मानो उसी के दिल में ईश्वर बसता है।
वक्त कभी साथ होता है तो कभी खिलाफ होता है।
वक्त के साथ हमें बदलना पड़ता है।

श्री पालजीभाई वी राठोड़ ‘प्रेम’
(सुरेंद्रनगर- गुजरात)

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!