संस्मरण — जब माँ नही होती। रिंकी माथुर

जब मन नहीं होती सब कुछ सुना सुना सा लगता है तो कुछ होता है पर कहीं कुछ कमी दिखती है जैसे बिन शक्कर की चाय वैसा।
मन नहीं होती जब कोई डांट कर कुछ करने वाला नहीं होता है रात जब देर से लौटता हूं घर को तब अधीर होकर बार-बार खिड़की से कोई झांकता नहीं दिखता है कोई व्याकुल आंखों से रह सकता नहीं दिखता है कोई पूछता नहीं है कि थक गया होगा बेटा खाना परोस दूं।
मन नहीं होती है जब सुबह वैसे ही होती पूजा घर में बैठी दादी को कभी घंटी तो कभी दिए की बात ही नहीं मिलती है भगवान को बंदी के लड्डू का प्रसाद नहीं मिलता है पिताजी को मुझे बटुआ रुमाल चांदी हाथ में नहीं मिलते हैं रसोई घर में चौक की खुशबू वैसी नहीं आती है जी गंध की नाक को आदत हो गयी होती है।
पंछियों को दाना पानी समय से नहीं मिलता जब मन नहीं होती है तुलसी का पौधा मनु कह रहा होता है कहां है गृह लक्ष्मी उसके स्पर्श से मै भी हरी-भरी हो जाती हूँ। बस आज मन की सिर्फ यादें ही रह गई है कि वह कहीं किसी कोने से दिख जाए उनकी आवाज सुनने को मिल जाए यह सिर्फ यादें ही रह गई है।
रिंकी माथुर




