Uncategorized

बसंती उजास में स्त्री का सम्मान — मंजू शर्मा ‘मनस्विनी’

 

भारतीय ऋतुओं में बसंत का वही महत्व है जो नदियों में गंगा का और जलाशयों में समुद्र का। यह केवल एक ऋतु नहीं, बल्कि नवजीवन का उत्सव है। प्रकृति का शृंगार, धरती की मुस्कान और मन की वीणा पर छेड़ा गया मधुर राग है ।जैसे ही पीले सरसों के फूल खेतों में झूमते हैं, आम्र-मंजरी की सुवास हवाओं में घुलती है, और कोयल की कूक दिशाओं में रस घोलती है, वैसे ही मन के सूने आँगन में भी प्रेम का दीप जल उठता है।
बसंत का आगमन मानो यह संदेश देता है कि परिवर्तन ही जीवन का सत्य है। सूखी डालियों पर नई कोपलें यह विश्वास जगाती हैं कि हर पतझड़ के बाद हरियाली लौटती है। यही ऋतु प्रेम की खुमारी से कण-कण को भर देती है। वायु में मादकता, आकाश में उजास और धरती पर रंगों का उत्सव।
इसी रंगोत्सव का प्रतीक है होली…जो केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि समानता, समरसता और अपनत्व का पर्व है। इस दिन भेदभाव की दीवारें ढह जाती हैं, ऊँच-नीच का अंतर मिट जाता है और हर चेहरा एक ही रंग में रंग जाता है, मानवता के रंग में। गुलाल की एक चुटकी जैसे कहती है कि हम सब एक ही मिट्टी के बने हैं और यही बसंती उजास आगे बढ़कर स्त्री-शक्ति के सम्मान में भी झलकता है। रंगों और परंपराओं को सँजोए रखने वाली, हर उत्सव में जीवन का स्पंदन भरने वाली भारतीय स्त्री जब मंचों पर सम्मानित होती है और अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की शुभकामनाएँ पाती है, तब यह केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि उसकी सहनशीलता, सृजनशीलता और संस्कारों की धरोहर को नमन होता है।
बसंत हमें सिखाता है कि जीवन में प्रेम हो, होली हमें सिखाती है कि जीवन में समता हो, और महिला दिवस हमें याद दिलाता है कि जीवन की धुरी स्त्री है।
जब ये तीनों भाव एक साथ आते हैं, तो सृष्टि एक सुंदर स्वरूप में नजर आती है।
आइए, इस बसंत में हम केवल प्रकृति को ही नहीं, अपने विचारों को भी नवीन करें। होली के रंगों से केवल चेहरे ही नहीं, मन भी रंगें, और महिला दिवस पर केवल शब्दों से नहीं, अपने व्यवहार से भी स्त्री को सम्मान देकर साकार करें।
तभी बसंत सचमुच गंगा-सा पावन और समुद्र-सा व्यापक बन पाएगा।

मंजू शर्मा ‘मनस्विनी’

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!