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वसीयत — सीमा शुक्ला चांद

 

एक वक्त आएगा जब गर्माहट इस देह की हो जाएगी समाप्त
कोलाहल क्रंदन शोर सिसकियां होने लगेगी हर जगह व्याप्त
तब शायद तुम पर होगा ना वक्त भी संग बैठने‌ का पर्याप्त
तब देखना तुम मेरे अधरों को और बूझना हर अल्फ़ाज‌ जो हों कहीं अज्ञात
देखो देख पा रहे हो वो उल्लास
जो था‌ मेरी गर्म देह के सदा पास
तो खुश‌ हो जाओ ना अभी
न हो तनिक भी तुम निराश
याद करो धूमिल आंखों से भी
मैं छूना चाहती थी खुला हुआ आकाश

अरे इतनी जल्दी क्या है कुछ देर से उठाना मेरी ये ठठरी रूपी ताश
अभी कुछ‌ वक्त तो बिताओ मेरे इस ठंडी देह के भी पास
चलो थोड़ा सा और बनाओ मेरी इस विदाई को खास
बहुत तस्वीर खिंचती थी एक तस्वीर तुम भी खिंचो आकर मेरे आसपास
सुनो
मुझे बेरंग नहीं चुकंदर का लाल रंग ही देह पर पहनाना
जाओ बाजार से मैचिंग चूड़ियां बिंदिया टोपी भी लाना
और लाना सूरज से सुनहरा रंग गुलाबी गुलाब का गुलाल गाल पर लगाना
अब ज़रा देखो
कैसी लग रही हैं यह देह ठंडी दुल्हन की
बातें सुनोगे क्या तुम और कुछ मेरे मन की
वो संतरे का सिंदूर भी लगा देना हनुमन का
कहलाता है जो अभिन्न आभूषण स्त्री तन का
अरे ठहरो
बस अभी चलेंगे हम थोड़ी सी देर में
अपनो के कंधो पर चढ़ नगर की सैर में
तुम खड़े मत होना आज देखो दूर गैर में
हाथ पकड़कर गले लगाना पहनाना पायल पैर में
अब बस
कुछ अच्छे गीत अच्छे नृत्य की तुम करना तैयारी
रोकर बिलखकर नहीं नाचते हुए निकालना घर से ठठरी हमारी
अरे ये क्या! तुम हमे श्मशान क्यूं ले आए
सोचो जले हुए को ये अग्नि भला कैसे जलाऐ
नर्मदा मां की लहरें देखो मुझे कब से रही बुलाए
कृपया मेरी यह देह मां नर्मदा को ही देकर आए
देखो
जब ढूंढोगे मुझको इस गगन आकाश में
पाओगे हर बार मुझे खिलते हुए पलाश में
कभी दिखे कोई तुम्हें सजा-धजा खुद की तलाश में
मैं मिल जाऊ़गी देखना तुम्हें तम से निकले प्रकाश में
जानते हो
बहुत तस्वीर हैं मेरी पर नहीं है तुम्हारी कोई तस्वीर
चाहत पर लगा रक्खा था सादा ही तुम्हारा अबीर
तो आज बदल दो तुम मेरी ये विरह वाली तकदीर
मेरे सीने पर संग भेजना तुम्हारी वो प्यारी मुस्कान वाली तस्वीर
सीमा शुक्ला चांद

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