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अपूर्णता की स्मृतियाँ और प्राप्तियों की विस्मृति — ओम कुमावत

भारत ने हाल ही में टी-20 विश्व कप जीता, तब पूरे देश में उल्लास की लहर दौड़ गई। करोड़ों दर्शकों की तरह एक सामान्य क्रिकेट प्रेमी भी उस क्षण अत्यंत प्रसन्न था। जीत के समय गर्व, उत्साह और संतोष की भावना इतनी प्रबल थी कि ऐसा प्रतीत होता था मानो यह खुशी लंबे समय तक बनी रहेगी। किंतु आश्चर्य यह है कि कुछ ही समय बाद वह असाधारण आनंद धीरे-धीरे सामान्य अनुभव में परिवर्तित होने लगता है। जीवन अपनी स्वाभाविक गति से आगे बढ़ने लगता है और वह महान उपलब्धि भी दैनिक जीवन की स्मृतियों में एक साधारण घटना बनकर रह जाती है।
इसके विपरीत, 19 नवम्बर 2023 का वह दिन—जब भारत एकदिवसीय विश्व कप के फाइनल में पराजित हुआ—आज भी अनेक लोगों के मन में एक पीड़ा के रूप में उपस्थित है। उस हार को स्मरण करते ही मन में एक कसक-सी उत्पन्न हो जाती है। यह अनुभव दर्शाता है कि जहाँ जीत की खुशी समय के साथ सामान्य हो जाती है, वहीं पराजय की स्मृति कहीं अधिक गहराई से मन में अंकित रह जाती है।
यह केवल खेल से जुड़ी भावना नहीं है, बल्कि मानव स्वभाव का एक व्यापक सत्य है। मनुष्य अपनी उपलब्धियों की अपेक्षा अपने अभावों को अधिक समय तक स्मृति में संजोकर रखता है। जब तक कोई वस्तु या उपलब्धि हमारे पास नहीं होती, तब तक उसका महत्व अत्यधिक प्रतीत होता है। किंतु जैसे ही वह हमारे अधिकार में आ जाती है, उसकी नवीनता धीरे-धीरे क्षीण होने लगती है और वह जीवन का सामान्य हिस्सा बन जाती है।
दूसरी ओर, जो प्राप्त नहीं हो सका, वही स्मृति और कल्पना में अधिक मूल्यवान प्रतीत होता है। यही कारण है कि मनुष्य अक्सर अपनी अनेक उपलब्धियों के बीच भी किसी एक कमी पर दृष्टि टिकाए रखता है। उसके पास जो कुछ है, उसकी अनुभूति धीरे-धीरे सामान्य हो जाती है, परंतु जो नहीं है वही उसके विचारों में बार-बार उपस्थित होता रहता है।
इस स्थिति में मनुष्य के लिए प्रसन्नता और दुःख का संतुलन भी विचित्र रूप ले लेता है। प्रसन्न होने के लिए जहाँ कभी-कभी एक छोटी-सी उपलब्धि भी पर्याप्त होती है, वहीं दुःखी होने के लिए अनगिनत कारण ढूँढ लेना भी मनुष्य के लिए कठिन नहीं होता। मानो मनुष्य के भीतर कहीं यह प्रवृत्ति विद्यमान हो कि वह अपनी कमी को अधिक स्पष्ट रूप से देखे और अपनी प्राप्तियों को सहज मान ले।
संभवतः इस प्रवृत्ति से ऊपर उठने का एक मार्ग यह है कि मनुष्य समय-समय पर अपनी उपलब्धियों के प्रति सचेत होकर उन्हें स्वीकार करे। यदि वह यह समझ सके कि जीवन में जो कुछ प्राप्त हुआ है वह भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है, तो उसका दृष्टिकोण अधिक संतुलित हो सकता है। क्योंकि वास्तविक संतोष केवल अभावों की गणना से नहीं, बल्कि उपलब्धियों की पहचान से उत्पन्न होता है।
अंततः जीवन का सत्य यही है कि पूर्णता शायद ही किसी को प्राप्त होती है। मनुष्य का जीवन सदैव कुछ प्राप्तियों और कुछ अपूर्णताओं के मध्य ही निर्मित होता है। किंतु जो व्यक्ति अपनी प्राप्तियों के प्रति कृतज्ञ रहना सीख लेता है, वही जीवन के वास्तविक आनंद को अधिक गहराई से अनुभव कर पाता है।

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