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मेरे मन की पीड़ा” – लघु कहानी — सुमन दूबे सांऊखोर बड़हलगंज गोरखपुर

 

रात का सन्नाटा था। सब सो चुके थे, लेकिन मेरी आँखों में नींद नहीं थी। दिल के अंदर जैसे कोई अनकही बात बार-बार दरवाज़ा खटखटा रही थी।

दिन भर मैं हँसती रहती हूँ, सबके बीच खुश दिखती हूँ। कोई पूछे तो कह देती हूँ- “सब ठीक है।” पर सच तो यह है कि सब ठीक नहीं है। कुछ बातें ऐसी होती हैं जो किसी से कही नहीं जातीं, बस मन के किसी कोने में चुपचाप जमा होती रहती हैं।

उस रात मैंने खुद से सवाल किया- “क्यों छुपा रही हूँ मैं अपनी तकलीफ़?”

उत्तर भी वहीं था- “क्योंकि डर लगता है… कहीं कोई समझे ही ना।”

धीरे-धीरे समझ आया कि दर्द को छुपाने से वह कम नहीं होता, बल्कि और गहरा हो जाता है। उस दिन पहली बार मैंने अपनी डायरी खोली और मन की सारी बातें लिख दीं। शब्दों के साथ आँसू भी बहते गए, और मन थोड़ा हल्का हो गया।

सुबह जब सूरज निकला, तो लगा जैसे मेरे अंदर भी एक नई रोशनी आई है। शायद सबको समझना जरूरी नहीं होता, कभी-कभी खुद को समझ लेना ही सबसे बड़ी राहत होती है।

सीखः

हर दर्द को छुपाना जरूरी नहीं, कभी-कभी उसे स्वीकार करना ही सच है।

(स्वरचित)

सुमन दूबे सांऊखोर
बड़हलगंज गोरखपुर

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