इंतज़ार –डॉ इंदु भार्गव

शाम के सुनहरे आभा में रेल प्लेटफॉर्म की हल्की-हल्की आवाज़ों के बीच खड़ी थी छवि नेहा, राहुल – उसकी आँखों में समंदर-सी गहराई थी आकाश सी विशालता माँ भारती का ज़ज्बा, हिदृय मे-लिये विचारो मे खोई छवि हाथ थामे छोटी-सी नेहा , जो दिन भर की कहानी कहती आंखे, थकान-evidence मे कहती थी।
हर पाँच मिनट बाद, वह प्लेटफ़ॉर्म पर पँहुचकर उस ट्रेन का इंतज़ार करती थी—जिससे वीरों को लौटकर आना था।
राहुल सेना में थे। देश-सेवा में जुटा उनका काम उसे अक्सर दूर ले जाता था—कहीं पहाड़ों में, कहीं रेगिस्तानी इलाकों में। राहुल को पता था कि हर मिशन के बाद – चाहे वो दिन हों या रात – उनके लौटने की संभावना कम होती है। पर फिर भी, हर दिन एक उम्मीद-की किरण लिए, वह उस ट्रेन की प्रतीक्षा करती थी।
प्लेटफ़ॉर्म पर आने वाली-जाने वाली ट्रेनों की आवाज़ में छवि के दिल में एक ही सवाल गूँजता था: वो आएँगे या नहीं?
उसके दिमाग़ में बीते समय की झलकें उभरती थीं—राहुल- की मुस्कान, और माँ का आशीर्वाद उनके साथ था बेटी के साथ , और उनकी एक-एक बात। विशेषकर उस दिन की बात जिसे वह कभी नहीं भूली:
“मैं जल्द ही आ जाऊँगा, राहुल ने कहा था!
वो शब्द, सुनते ही बेटी नेहा ने अपने हाथ में छोटी-सी पलकें बंद कर ली थीं—और उस वादे को दिल की गहराई में बो दिया था।
अब, प्लेटफ़ॉर्म पर हर ट्रेन की आवाज़ के साथ उसकी धड़कनों की गति बढ़ जाती। उसे लगता था कि शायद यही वो ट्रेन होगी।
लेकिन ट्रेन आई—खड़ी हुई चली भी गयी—और राहुल नहीं आए ।
हर बार, वही आभानी झटका—उम्मीद का टूटना।
लेकिन किसी की उम्मीद हार नहीं मानती। क्योंकि हार मानना उनकी कहानी का हिस्सा नहीं था।
आज-भी, शाम ढलने लगी थी। प्लेटफ़ॉर्म के लैंपों की रोशनी मंद पड़ रही थी। शेखर अपना चाय की कप लेकर बेंच पर बैठा और बिजली-सी गति से हवा में अपनी आड़ में गिरती पत्तियों को देखा।
उसकी चाय ठंडी हो चुकी थी, लेकिन वह उसे धीरे-धीरे पी रहा था—मानो इस ठंडापन से वह इंतज़ार की सच्चाई को स्वीकार कर रहा हो।
कुछ दूरी पर एक ट्रेन आकर रुकी। शेखर ने उम्मीद भरी निगाहों से देखा। उतरते-उतरते पैसेंजर्स के बीच एक शख्स झुका—टिकट चेकर हो सकता था। नेहा छवि ने आँखें तस्वीर की तरह फैलाई—लेकिन देखा नहीं, वह शख्स राहुल नहीं था। वो चला गया।
सब ने गहरी सांस ली।
“आप क्यों देरी करते हो?” वो ख़ामोशी में खुद से बोली।
उसके भीतर एक दर्द था, जिसे शब्दों में बाँधना मुश्किल था।
वो याद करने लगी– राहुल की हंसी, उनका हाथ थामने का पल, वे बातें जो उन्होंने भविष्य की तरह सुनाईं थीं… और अब? इंतज़ार ही इंतज़ार।
लेकिन साथ ही, उसकी आँखों में एक चमक थी—विश्वास की।
वह जानती थी– राहुल
लौटेंगे।
क्योंकि उनकी वाणी में आत्मा का हिस्सा था। क्योंकि उनका “जल्दी आ जाऊँगा” सिर्फ़ शब्द नहीं था—वादा था।
और नेहा छवि उस वादे को हर-रोज़ जिंदा रखती थी।
शाम का अँधेरा बढ़ रहा था। प्लेटफ़ॉर्म खाली हो गया। रशेखर छवि का भाई- ने अपनी चाय का खाली कप रखा और उठने लगा।
उस ने कदम बढ़ाए—हर कदम में एक धड़कन थी, हर साँस में इंतज़ार की आभा थी।
और जैसे‐ही वह स्टेशन से बाहर निकलने लगे, उसने पीछे मुड़कर देखा।
फिर एक ट्रेन की सीटी गूँजी।
उस क्षण, उसके हाथ थिरके—क्या वह?
या फिर सिर्फ इंतज़ार का झिलमिलाता सपना?
नेहा ने आँखें बंद कीं और मुस्कुरा दी—
“मैं यहाँ रहूंगी। इंतज़ार करूँगी। क्योंकि पापा, मैं जानती हूँ—you’ll come back.”
उसकी आवाज़ हवा में घुल गई, पत्तियाँ सरसराईं, और प्लेटफ़ॉर्म की बेंच पर एक खाली कप और भी इंतज़ार में खड़ी रह गयी नेहा।
सामने दो फ़ौजी अफसर तिरंगे मे लिपटे राहुल को लिए सलामी दे रहे थे
राहुल घर आए तिरंगा हाथ थाम नहीं तिरंगे मे लिपट
सभी घर गए नेहा माँ को समझा रहीं थीं माँ पापा आयेंगे हमे इंतजार करना हैं!
दो जोड़ा बूढे कांपते हाथ ने राहुल को थामा
रुदन करते स्वर शहिद राहुल की जय कारः कर रहे थे!
नन्ही नेहा कुछ समझी कुछ नहीं इंतजार पापा का उसे आज भी है!!
डॉ इंदु भार्गव जयपुर!!




