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पूज्य जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी महाराज एवं पूज्य प्रेमानन्द जी महाराज: तुलनात्मक-अध्ययन। लेखक:–ज्योतिषाचार्य अरुण कुमार मिश्र

पूज्य जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी महाराज एवं पूज्य प्रेमानन्द जी महाराज: तुलनात्मक-अध्ययन।
लेखक:–ज्योतिषाचार्य अरुण कुमार मिश्र

भारतीय संत-परंपरा में ज्ञान और भक्ति का अद्वितीय-मिश्रण देखने को मिलता है। हर संत अपने समय और अपने क्षेत्र में अनुयायियों को मार्गदर्शन देते हैं। वर्तमान समय में दो ऐसे संत हैं, जिनका प्रभाव और चर्चा संत समाज में विशेष रूप से दिखाई देती है—जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी महाराज और पूज्य प्रेमानन्द जी महाराज।

प्रस्तुत लेख में हमनें अपने दृष्टिकोण से, तटस्थ रहते हुये, उनका जीवन, योगदान और वर्तमान विवादों का विश्लेषण प्रस्तुत कर रहा हूँ।

दोनों महान् संतो का जीवन-परिचय:-

जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी महाराज का जन्म 1950 में शंडीखुर्द, जौनपुर (उत्तर-प्रदेश) में हुआ। दृष्टिहीन होने के बावजूद उनका स्मरणशक्ति और शास्त्रों का अध्ययन असाधारण रहा। उन्होंने समाज सेवा और शिक्षा के क्षेत्र में योगदान दिया, जिसमें जगद्गुरु रामभद्राचार्य दिव्यांग-विश्वविद्यालय, चित्रकूट की स्थापना विशेष उल्लेखनीय है।

प्रेमानन्द जी महाराज का जन्म 1969 में कानपुर में हुआ। किशोरावस्था में वृन्दावन आगमन और माधुर्य-भक्ति की साधना ने उन्हें सरल, भावप्रधान और रसपूर्ण प्रवचनकर्ता के रूप में स्थापित किया। उनकी कथा-शैली भक्तों और युवाओं में गहरी छाप छोड़ती है।

योगदान और शैली:-

रामभद्राचार्य जी महाराज की शैली शास्त्राधारित और प्रमाणपरक है। उनके प्रवचन और लेखन में गहन-तर्क और विद्वत्ता दिखाई देती है। उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता , रामचरितमानस, महाभारत और वाल्मीकि-रामायण पर भाष्य लिखकर शास्त्रीय-परंपरा को आगे बढ़ाया।

प्रेमानन्द जी महाराज की शैली भावप्रधान और सरल है। उनके प्रवचन राधा-कृष्ण की लीलाओं और भक्ति रस से पूर्ण हैं। श्रोता उनकी कथा सुनकर “सहज-भावनात्मक-रूप” से जुड़े रहते हैं।

विवाद और वर्तमान-स्थिति:-

हाल ही में रामभद्राचार्य जी महाराज ने प्रेमानन्द जी पर यह टिप्पणी की कि उन्हें संस्कृत का पूर्ण ज्ञान नहीं है। इस टिप्पणी ने संत-समाज में बहस उत्पन्न की। कई संतों ने इसे आलोचनात्मक दृष्टि से देखा, जबकि भक्तजन प्रेमानन्द जी के पक्ष में खड़े हुये। बाद में रामभद्राचार्य जी ने स्पष्ट किया कि प्रेमानन्द जी उनके लिए पुत्रवत हैं और उनका उद्देश्य केवल मार्गदर्शन था।

इसके अतिरिक्त, रामभद्राचार्य जी ने अयोध्या श्रीराम-मंदिर-निर्माण का समर्थन किया, जबकि चारों शंकराचार्यों ने इसे अवैदिक प्रक्रिया बताकर विरोध किया। ये घटनायें संत-समाज में संतुलन, नेतृत्व और मान्यता के प्रश्न को सामने लाती हैं।

तुलनात्मक-दृष्टि:-

१. जन्म और पृष्ठभूमि:-

रामभद्राचार्य जी : जौनपुर में जन्म; बाल्यावस्था में दृष्टिहीनता के बावजूद गहन अध्ययन।
प्रेमानन्द जी : कानपुर में जन्म; किशोरावस्था में वृन्दावन आगमन, भक्ति साधना।

२. आध्यात्मिक-शैली:-

रामभद्राचार्य जी : शास्त्राधारित, तर्कपूर्ण, दार्शनिक प्रवचन।
प्रेमानन्द जी : भावप्रधान, सरल, रसपूर्ण-प्रवचन।

३. संस्थागत योगदान:-

पूज्य रामभद्राचार्य जी : दिव्यांग-विश्वविद्यालय, चित्रकूट।
पूज्य प्रेमानन्द जी : वृन्दावन में कथा-मंडपों और भक्ति-आंदोलनों का नेतृत्व।

४. समकालीन-विवाद:-

रामभद्राचार्य जी : संस्कृत-ज्ञान पर टिप्पणी; शंकराचार्यों की उपेक्षा।
प्रेमानन्द जी : शास्त्रीय-पांडित्य की कमी का आरोप; संत-समाज का समर्थन।

५. संत-समाज की प्रतिक्रिया:-

रामभद्राचार्य जी की आलोचना; उन्हें “अहंकारी” कहा गया।

प्रेमानन्द जी को व्यापक-समर्थन प्राप्त।

६. प्रभाव और लोकप्रियता:-

रामभद्राचार्य जी : विद्वान-वर्ग, शास्त्रीय-परंपरा में प्रभावशाली।
प्रेमानन्द जी : आम जनता, युवाओं और भाव-रसिक भक्तों में लोकप्रिय।

७. समग्र-निष्कर्ष:-
रामभद्राचार्य जी ज्ञान और शास्त्र पर केंद्रित संत हैं। प्रेमानन्द जी भक्ति और भावनात्मक-समर्पण के प्रतीक हैं। दोनों संतों का तुलनात्मक-अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि आधुनिक-संत-परंपरा में भक्ति और ज्ञान का संतुलन महत्वपूर्ण है।

निष्कर्ष:-
समकालीन-समय में संतों का कार्य केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक विमर्श से भी जुड़ा है। विवादों के बावजूद दोनों संतों ने संत समाज और श्रद्धालुओं के जीवन में मार्गदर्शन और प्रेरणा का कार्य किया है। संतुलित दृष्टि से दोनों संतों का योगदान “आधुनिक-संत-परंपरा” की वास्तविक-शक्ति को दर्शाता है।
हम आशा करते हैं कि आपको हमारी मौलिक-रचना पसन्द आयी होगी।

लेखक:-
ज्योतिषाचार्य अरुण कुमार मिश्र (आचार्य अरुण दैवज्ञ )
“प्रेरक-वक्ता”
राष्ट्रीय अध्यक्ष:-
माँ शारदा वेलफेयर सोसाईटी (NGO)
सम्पर्क सूत्र:- +91-9450276488
Email. arunkumarmishrabhu@gmail.com

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