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लुप्त होते संस्कार  — राजेन्द्र परिहार सैनिक

 

समय चक्र चलता रहता है बदलता रहता है,किंतु हमारे मूलभूत संस्कार नहीं बदलने चाहिए, तभी यह समाज उन्नति करता है।कथित आधुनिकता के दौर में संस्कारों में विकार पैदा हो गए हैं। संस्कारों का सुदृढ़ गढ़ ढहने की कगार पर पहुंच चुका है। आधुनिक अविष्कार जितने सुविधा जनक साबित हो रहे हैं,उनका एक काला पक्ष भी है जो कि निरंतर संस्कारों के पतन का कारण बन रहा है। मनुष्य स्वयं को आधुनिक कहलाने
की होड़ में एक अंधी दौड़ में संस्कारों को पीछे छोड़ कर आगे बढ़ता हुआ महसूस तो कर रहा है लेकिन नैतिकता के पतन का कारण भी बन रहा है। आजकल अभिभावक भी अपने बच्चों को अंग्रेजी शिक्षा और आधुनिक रहन सहन हेतु प्रेरित कर रहे हैं। संभ्रांत
परिवारों की देखा देखी मध्यम वर्ग में भी स्पर्धा भाव जागृत हो रहे हैं। आधुनिकता हमारी संस्कृति और संस्कारों को नेस्तनाबूत करने पर आमादा है,यह समझने का किसी को समय है ना ही वो दृष्टि जो समाज के गिरते हुए स्तर को देख सके।भारत की
धरती पर जब जब समाज पतन की ओर बढ़ता नज़र आया है,कोई ना कोई समाज सुधारक पैदा होता रहा है और समाज सुधार में महति भूमिका निभाता रहा है, किंतु वर्तमान समय में कोई ऐसा समाज सुधारक नज़र नहीं आ रहा है जो पतनोन्मुखी समाज को सही राह दिखा सके। आधुनिकता की आड़ में लुप्त होते संस्कार हमें पतन के चरम पर ले जाकर छोड़ेंगे अथवा समय फिर से करवट बदलेगा। वस्तुत: अभी तक तो प्रतीक्षा
है कि हम सब अपने स्वर्णिम संस्कारों के प्रति संपूर्ण आशान्वित हों।

राजेन्द्र परिहार सैनिक

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