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कैसा हो माता पिता का व्यवहार,जब जाएं बेटा बेटी के परिवार — प्रवीणा सिंह राणा “प्रदन्या”

 

जब माता-पिता अपने बेटा-बेटी के घर जाते हैं, तो वह केवल एक यात्रा नहीं होती,वह रिश्तों की नाज़ुक डोर पर चलने जैसा अनुभव होता है। अपने ही रक्त से बने परिवार में अतिथि बन जाना, आत्मीयता और संकोच के बीच संतुलन साधने की एक मौन साधना है।
माता-पिता का व्यवहार वहाँ सहज, सौम्य और विनम्र हो जाना चाहिए। यह याद रखना आवश्यक है कि अब वह घर किसी और की दिनचर्या, नियमों और जिम्मेदारियों से संचालित होता है। हर बात पर टोका-टोकी, हर आदत पर टिप्पणी और हर व्यवस्था में हस्तक्षेप ये सब अनजाने में रिश्तों में दूरी पैदा कर देते हैं। प्रेम जताना अधिकार नहीं, संवेदनशीलता से भरा भाव होना चाहिए।
जब वे घर में प्रवेश करते हैं, तो उनके चेहरे पर अपनापन हो, पर आचरण में मर्यादा। वे सलाह दें, पर आदेश न बनें। सहयोग करें, पर नियंत्रण न करें। बेटे-बहू या बेटी-दामाद के रिश्ते का सम्मान करना, उनके निजी समय और निर्णयों को स्वीकार करना,यही सच्ची समझदारी है। बच्चों से स्नेह हो, पर माता-पिता के अधिकार के नाम पर अनुशासन का कठोर प्रदर्शन न हो।
वहीं दूसरी ओर, उनके मन में यह भाव भी होना चाहिए कि वे बोझ नहीं, आशीर्वाद हैं। उन्हें अपने अनुभवों की सुगंध देनी है, अपनी अपेक्षाओं का भार नहीं। जब माता-पिता मौन से समझते हैं, कम बोलकर अधिक महसूस करते हैं, तब रिश्ते बोझ नहीं, वरदान बन जाते हैं।
अंततः, जब माता-पिता बेटा-बेटी के परिवार में जाते हैं, तो उनका व्यवहार ऐसा हो कि घर में शांति बढ़े, तनाव नहीं; अपनापन गहरा हो, दूरी नहीं। क्योंकि सच्चा रिश्ता वही है, जहाँ प्रेम अधिकार नहीं बनता, और सम्मान औपचारिकता नहीं—स्वाभाविक संस्कार बन जाता है।

प्रवीणा सिंह राणा “प्रदन्या”

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