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समय के आईने में समाज – लघु कथा – सुनीता तिवारी”सरस”

 

पुराने बाजार के मोड़ पर एक छोटी सी चाय की दुकान थी।
हर सुबह वहाँ अलग-अलग लोग आकर चाय पीते और देश समाज की बातें करते।

उस दिन भी कुछ लोग बैठे थे
कोई महंगाई की बात कर रहा था, कोई भ्रष्टाचार की, तो कोई नई पीढ़ी के बदलते संस्कारों पर चिंता जता रहा था।

दुकान का मालिक भीरू चुपचाप सबकी बातें सुन रहा था।
तभी एक बुजुर्ग व्यक्ति बोले,
आज का समाज बहुत बदल गया है।
पहले लोगों में अपनापन था, अब सब अपने-अपने में लगे रहते हैं।

पास ही बैठा कॉलेज का छात्र मुस्कराकर बोला,
बाबा, समाज तो वही है, बस समय का आईना बदल गया है।
पहले लोग कम साधनों में भी खुश रहते थे, आज सुविधाएँ बढ़ी हैं पर संतोष घट गया है।

इतने में एक मजदूर वहाँ आया।
उसने चाय ली और थके हुए स्वर में बोला, हम जैसे लोगों के लिए तो समाज आज भी वही है।

सुबह मेहनत, शाम को रोटी की चिंता।
फर्क बस इतना है कि पहले लोग एक-दूसरे का दुख बाँट लेते थे, अब सब जल्दी में रहते हैं।

बात सुनकर सब कुछ पल के लिए शांत हो गए।
भीरू ने धीरे से कहा,
समाज समय के साथ बदलता जरूर है, लेकिन उसका चेहरा हम सब से बनता है।
अगर हम बदल जाएँ, तो समाज भी बदल सकता है।

सबने एक-दूसरे की ओर देखा।
उस दिन चाय की उस छोटी-सी दुकान पर जैसे समय का आईना साफ दिखाई दे रहा था जिसमें समाज ही नहीं, हर व्यक्ति अपना चेहरा भी देख सकता था।

सुनीता तिवारी”सरस”

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