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वो बचपन की यादें रूहानी — राजेन्द्र परिहार सैनिक

 

हमारे राज्य में गर्मी तब (बचपन) कुछ ज्यादा ही हुआ करती थी।उस समय संसाधन फ्रिज कूलर ए०सीआदि नहीं हुआ करते थे।बचपन में आइसक्रीम वाले की साइकिल गाड़ी देख कर यूँ लगता था, कब इसको पकड़ लें और सारी आइसक्रीम खा जाएँ।सारे मित्र आइसक्रीम वाले की आवाज़ सुनकर पाँच-दस के सिक्के लेकर निकल आते।गली में जैसे ही उसकी घंटी बजती—- टन-टन… आइसक्रीम ले लो…
हम सब घरों से दौड़ पड़ते, कोई चप्पल पहनना भी भूल जाता, कोई माँ से छुपाकर पैसे ले आता। उस छोटी सी गाड़ी के चारों ओर बच्चों की भीड़ लग जाती।
किसी को नारंगी वाली पसंद थी, किसी को काला खट्टा, तो किसी को दूध वाली मलाई आइसक्रीम।
ठंडी-ठंडी आइसक्रीम जैसे ही हाथ में आती, लगता गर्मी आधी तो वैसे ही भाग गई। खाते-खाते भी हम ठेले के पीछे-पीछे चलते रहते, मानो अभी खत्म हो जाएगी तो क्या होगा।
मज़े की बात यह थी कि आइसक्रीम खत्म होने के बाद भी हम कुछ दूर तक उसके पीछे दौड़ते रहते।
शायद उस बचपन की मिठास को थोड़ा और देर तक थामे रखना चाहते थे।
आज सब कुछ है—
फ्रिज भी, तरह-तरह की आइसक्रीम भी। लेकिन वह बचपन की दौड़, दोस्तों की शरारत और सायकिल की घंटी की आवाज़… वह स्वाद अब कहीं खो सा गया है।
सच ही है, बचपन की छोटी-छोटी खुशियाँ ही जीवन की सबसे मीठी यादें बन जाती हैं।

राजेन्द्र परिहार सैनिक

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