भीतर का प्रकाश’ — -डो. दक्षा जोशी ‘निर्झरा’ अहमदाबाद ,गुजरात ।

अग़र भीतर का प्रकाश है,तो बाहरी अंधेरा कुछ नहीं कर सकता ।
अंतर्मन का प्रकाश: संकल्प और आत्म शक्ति की विजय
सृष्टि का नियम है कि जहाँ प्रकाश होता है, वहाँ अंधकार का अस्तित्व स्वतः समाप्त हो जाता है। लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि हम किस प्रकाश की बात कर रहे हैं? वह जो सूर्य से मिलता है, या वह जो हम स्वयं अपने भीतर प्रज्वलित करते हैं? आत्म साक्षात्कार और आंतरिक ऊर्जा:
बाहरी अंधकार;चाहे वह असफलता हो, सामाजिक आलोचना हो या जीवन की कठिन परिस्थितियाँ;हमें तभी विचलित कर पाता है जब हमारा ‘स्व’ कमज़ोर होता है। जब एक मनुष्य अपने आत्म-तत्त्व को पहचान लेता है, तो उसके भीतर ज्ञान और आत्मविश्वास का एक ऐसा दीपक जल उठता है जिसकी लौ को संसार की कोई भी आँधी बुझा नहीं सकती।
अंधेरा वास्तव में कुछ और नहीं, बल्कि प्रकाश की अनुपस्थिति है। इसी तरह, दुःख या निराशा केवल सकारात्मक विचारों की कमी है। यदि हमारे विचार सकारात्मक हैं और हमारी दृष्टि स्पष्ट है, तो हम घोर अंधेरे में भी मार्ग खोज लेंगे। महापुरुषों का जीवन इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने विपरीत परिस्थितियों (बाहरी अंधेरे) को कभी अपनी प्रगति में बाधा नहीं बनने दिया, क्योंकि उनका आंतरिक संकल्प अत्यंत तेजस्वी था।
भीतर का प्रकाश असल में हमारा विवेक है। यह हमें सही और ग़लत के बीच भेद करना सिखाता है। जब हृदय में करुणा, सत्य और धैर्य का प्रकाश होता है, तो बाहर का ईर्ष्या, द्वेष और भ्रम रूपी अंधकार निष्प्रभावी हो जाता है।
दीपक कभी नहीं बोलता, उसका प्रकाश उसका परिचय देता है।
आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में हम अक़्सर बाहरी चमक-धमक में खो जाते हैं और अपने आंतरिक मौन को भूल जाते हैं। अवसाद और चिंता का सबसे बड़ा कारण यही है कि हमने बाहर के उजाले पर तो बहुत काम किया, लेकिन अपने भीतर के अंधेरे को दूर करने का प्रयास नहीं किया। ध्यान, स्वाध्याय और आत्म-चिंतन ही वे साधन हैं जिनसे हम अपने भीतर के प्रकाश को जगा सकते हैं।
-डो. दक्षा जोशी ‘निर्झरा’
अहमदाबाद ,गुजरात ।




