मन के गलियारे से — 2 अक्टूबर स्वच्छता दिवस और अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस-
क्या कहूं क्या ना कहूं
मन के अंधेरे में स्वच्छता रूपी प्रकाश कहां से लाऊं।
मन तो बहुत चंचल है
वह ढूंढने को चलता है प्रकाश
लेकिन अक्सर अंधियारे के दलदल में फंस जाता है
और अपने को अ स्वच्छ महसूस करने लगता है
इसी महसूस के सिलसिले में वह कई बार अस्वस्थ भी हो जाता है
पर मन तो मन ही है
क्या ही करे वह
क्या ना करें
इतनी द्रुतगामी है कि अक्सर जल्दी बाजी कर देता है ।
नहीं समझ पाता कि वह इस संसार में एक जीव के भीतरी रूप में प्रस्तुत है और
इसी रूप में उसकी महिमा है।
सत्य और अहिंसा का पाठ तो वह रोज ही पढ़ता है ,
पर दिन भर में सैकड़ो झूठ बोलता है।
तमाम लोगों को मानसिक यातनाएं पहुंचाता है।
और खुद भी मानसिक यातना झेलता है।
उसका मन इतना चंचल है की कभी एरोप्लेन में सफर करता है
कभी मर्सिडीज़ में
कभी तो बीएमडब्ल्यू या अन्य महंगी गाड़ी में।
वह पैदल चलना ही नहीं चाहता।
जैसे कि पांव थक जाते हों।
अपनी इस चंचलता की वजह से न जाने वह कितनी गलतियां कर बैठता है।
उसे पैदल चलने में सूखी रोटी खाकर पेट भरने में संतोष नहीं होता।
इसी चक्कर में वह यह भी भूल जाता है की संतोष उसका सबसे बड़ा साथी है।
मित्र है वह।
जिस मन को संतोष ना मिला उसका जीना बेकार है।
वह जीता तो है पर अ स्वच्छ होकर
और साथ ही साथ
अस्वस्थ भी हो जाता है।
इसलिए हे मन संतोष रूपी परम मित्र को पास रखो।
सुखी रहोगे स्वस्थ और स्वच्छ भी रहोगे।
जय भारत
जय बापू
जय गुदड़ी के लाल लाल बहादुर शास्त्री जी
जय जवान जय किसान
जय हिंद जय भारत।।।




