बचपन की बारिशें — रमेश शर्मा
बात उन दिनों की है जब मैं पांचवीं कक्षा में पढ़ता था। हम बनीपार्क जयपुर में रहते थे। मैं और मेरे बड़े भाई साहब यही भारतीय विद्यालय में पढ़ते थे। जुलाई में नया सत्र चालू हो गया था। सुबह स्कूल जाते और शाम को हम खेलते कूदते और धमा चौकड़ी मचाते थे।
उस समय ना टीवी था ना टेलीफोन और ना ही कोई मनोरंजन के साधन हुआ करते थे। बस को छुपम छुपाई, सितोलिया, या खो खो खेलते थे।
उस समय हमारे भाईसाहब ने नई नई साइकिल चलाना सीख रहे थे। कैंची चलाते थे। सीट तक पहुँच नहीं पाते थे। एक दिन हम स्कूल से वापस आये उस समय धीरे धीरे बारिश हो रही थी।
भाईसाहब ने मुझे साइकिल पर पीछे बिठाया और निकल पड़े। अचानक बारिश तेज हुई और सामने से कार आ गई। भाईसाहब का बैलेंस बिगड़ गया और हम दोनों साइकिल से सड़क पर गिर गये। मेरे कोहनी और घुटने छिल गए। हम दोनों चुपचाप घर आए और भाईसाहब ने मेरे डिटोल डाल कर रुई का बोला लगाकर पट्टी बाँध दी।
शाम को पिताजी आफिस से आज तो पूछा कैसे लगी। हम दोनों को डांटा और मुझे डाक्टर के पास लेकर गए। पट्टी करवाई और दवा दिलवाई।
आज भी बारिश आते ही बचपन की घटना याद आ जाती है।
रमेश शर्मा




