सुबह की चाय — उर्मिला पाण्डेय उर्मि

कहानी
एक भागलपुर गांव में एक महिला रहती थी उसका नाम गुलाब देवी था। बड़े प्रेम से वह अपना जीवन यापन करती थी।उसके दो लड़के रामनारायण और श्याम नारायण उसे अपने बच्चों से बहुत प्रेम था।उसका पति परचूनी की दुकान करता था। एक उसे बहुत बड़ी लत लगी हुई थी कि वह सुबह-सुबह चाय पिये बिना कुछ नहीं करती थी। सुबह-सुबह सबसे पहले चाय पीकर ही आगे कुछ काम करती।
ज़्यादातर सभी को अब चाय की लत लगी हुई है। जब तक सुबह की चाय ना मिले कुछ अच्छा नहीं लगता।
एक दिन की बात है कि घर में
किसी बहू ने चाय नहीं बनाई और दूध भी बच्चों को पीने को दे दिया अब तो गुलाब देवी बहुत परेशान घर में बिल्कुल दूध नहीं था सुबह हुई गुलाब देवी बड़ी परेशान हो रही थी उसे चाय बनाने का कोई उपाय न सूझा वह एक पड़ोसी के यहां गयी वहां भी चाय नहीं मिली पड़ोसी ने कांफी पिला दी अब तो बहुत परेशान होकर वह सुबह-सुबह सात बजे करीब दूध वाले की दुकान खुली वहां दूध मिला वह भी फटा हुआ।
गुलाब देबी ने दूधवाले से कहा कोई उपाय बताएं मुझे चाय पीने को कैसे मिले। दूधवाले ने कहा कि हमारे घर चलो मेरी बीवी भी चाय पीती है वह अपने लिए बनाएगी आपके लिए भी बना देगी। फिर क्या था गुलाब देवी उस दूधवाले के घर गयीं उसकी पत्नी ने चाय बनाई बिल्कुल पतली लेकिन गुलाम देवी को वह चाय अमृत की तरह जान पड़ी।
गुलाब देवी ने कहा कि सुबह-सुबह की चाय एक अमृत है दूध मट्ठा दधि कुछ भी अच्छा नहीं लगता जब तक सुबह-सुबह चाय नहीं मिल जाती।
चाय जीवन का हिस्सा बन गई है।
मानव के जीने का नुस्खा बन गई है।
दूध मलाई सुबह-सुबह न भाती है
जब तक न ये चाय मिल जाती है।
उर्मिला पाण्डेय उर्मि कवयित्री मैनपुरी उत्तर प्रदेश।




