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संतान की लंबी आयु के लिए जीवित्पुत्रिका का व्रत ! संगीता झा

 

संतान की लंबी आयु , स्वास्थ्य और सफलता की कामना लेकर जीवित्पुत्रिका का व्रत रखा जाता है।
इस व्रत को जीमूतवाहन व्रत और कहीं कहीं जितिया व जिउतिया भी कहा जाता है।यह व्रत तीन दिवसीय अश्विन माह की कृष्ण पक्ष की सप्तमी नहाय खाय से शुरू होकर , अष्टमी को निर्जल रह नवमी में पारण के साथ संपन्न होता है। इसमें जीमूतवाहन की गोबर से मूर्ति बना जो की विष्णु भगवान का रूप हैं ,नदी के किनारे कथा सुनी या पढ़ी जाती है। आजकल के समय में कलश रख कर कथा कर लिया जाता है।
इस व्रत का जुड़ाव महाभारत काल से ही है,पौराणिक कथाओं के अनुसार अश्वथामा ने पांडवों के सभी सोते हुए पुत्रों के साथ अभिमन्यु के अजन्मे बेटे को भी मार दिया था। तो भगवान श्री कृष्ण ने द्रोपदी के इस व्रत के प्रभाव से अर्जुन के पोते को गर्व में ही जीवित कर दिया जिस कारण उसका नाम जीवित्पुत्रिका पड़ा। यही कारण है कि
माताएं अपनी संतान की लंबी आयु व स्वास्थ्य के लिए यह व्रत रखती हैं ।साथ ही इसकी व्रत कथा में चिल्ली और सियारिन का भी उल्लेख है। यह व्रत अत्यंत कठिन व्रतों में से एक है । क्योंकि यह व्रत निर्जल रह कर बहुत से नियमों के साथ किया जाता है ।
इस व्रत को शुरू करने से पूर्व मडुआ की रोटी, नेनुआ का साग, झिंगली तोरी, पोई साग, काशीफल,दही आदि खाया जाता है। साथ ही समापन पर कढ़ी बड़ी और कई प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन, पकौड़े आदि बनाए जाते हैं।
ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को करने वाली महिलाओं के संतान को कोई संकट नहीं आता अथवा उनको कभी संतान वियोग नहीं होता। यह व्रत उत्तर प्रदेश,बिहार , झारखंड और बंगाल आदि में ज्यादा प्रचलित है।

संगीता झा “संगीत” (नई दिल्ली)

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