नवरात्रि:::अष्टमी का विशेष महत्व — नरेंद्र त्रिवेदी

हिंदू धर्म में नवरात्रिका विशेष महत्व है। हर साल आश्विन माह के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा तिथि से शारदीय नवरात्रि शुरू होती है। घर और धार्मिक स्थानों पर माताजी की कलश स्थापना की जाती है।सभी घरोंमें नौ दिनों तक माताजीकी पूजा की जाती है। आज हम बात करेंगे माताजी के आठवें दिनके रूप के बारे में जो महागौरी रूपमें मनाया जाता है। आठवें दिनको दुर्गा अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। ऐ मा दुर्गाका रूप महागौरी को समर्पित है। उस दिन माताजी के मंदिरों में होम-हवन किया जाता है और शाम को यज्ञ की समाप्ति के बाद प्रसाद वितरित किया जाता है। जो सभी लोग आस्थासे ग्रहण करते है। अष्टमी को महागौरी दिवस भी कहा जाता है। एक पौराणिक कथा के अनुसार, माता पार्वतीजी ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। इसी बीच माता पार्वतीजी ने अन्न-जल त्याग दिया था। जिससे माताजी का पूरा शरीर काला पड़ गया। भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने माताजीको अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया, और उनके काले शरीर को गंगा जल से शुद्ध किया, जिससे माताजीका शरीर फिर से चमकीला हो गया। माताजीका रंग श्वेत हो गया इसलिए उन्हें महागौरी भी कहा जाता है। आठवें दिन कुंवारी कन्या के पूजन का विशेष महत्व है।कुँवारी कन्याये मा का स्वरूप होती है।अष्टमी, जो कि नवरात्रि का आठवां दिन है। उसकी आभा गुलाबी रंग की होती है। गुलाबी रंग दया, सदभाव और स्नेहका प्रतिनिधित्व करता है। उस दिन माताजीकी मूर्ति और माताजीका शृंगार सोम्या स्वरूपका होता है। माताजीका आठवां स्वरूप महागौरी स्वरूप है। माताजी सफेद वस्त्र पहनती हैं और बैल पर सवार होती हैं। इसके अलावा अष्टम का रंग गुलाबी होने से माताजीके शृंगार में गुलाबी रंग अधिक पसंद किया जाता है। एक हाथ में त्रिशूल, जो दुष्ट तत्वोंका नाश करने के लिए धारण किया है। दूसरे हाथ में डमरू है जो शिवजी को प्रिय है और संगीतका प्रतीक है। तीसरे हाथ में अभय मुद्रा है जो भक्तों को सुरक्षा का अभय वचन देती है। फिर चौथे हाथ से भक्तों पर कृपा बरसाते हैं। अष्टमी के दिनको नवरात्रके दिनमे अधिक महत्वका दिन माना जाता है। कई जगह नैवैद्य भी मा को अर्पण किया जाता है। हर जगह पूजा पाठ ओर गरबा गान किया जाता है।। लोग भक्ति भाव से नवरात्र के दिनमे पूजा अर्चन करते है।
नरेंद्र त्रिवेदी।(भावनगर-गुजरात)




