Uncategorized

मारवाड़ की सुबह – रेत पर बिखरा कुंकुम — नरसा राम जांगु

 

मारवाड़ की सुबह, सुबह नहीं होती, एक उत्सव होती है।

मेरी आँख खुली तो देखा, थार की सुनहरी रेत पर अभी-अभी सूरज ने केसरिया कुंकुम बिखेरा है। हवा में ठंडक है, पर उस ठंडक में भी एक गर्माहट है – मिट्टी की सोंधी महक की।

दूर कहीं, किसी कच्चे घर के आंगन से चूल्हे का धुआँ धीरे-धीरे नीम के पेड़ों से लिपटता हुआ आसमान की ओर जा रहा है। उस धुएँ के साथ ही बाजरे की रोटी की सोंधी खुशबू पूरे गाँव में बिखर रही है।

खेजड़ी की पतली टहनियों पर दो-तीन गौरैया फुदक रही हैं। पगडंडी पर ऊँट गाड़ी की घंटी टुन-टुन बजती हुई खेतों की ओर जा रही है। रबारी अपने ऊँटों के साथ, माथे पर पगड़ी और आँखों में सुबह जैसा उजाला लिए, धीरे-धीरे रेत पर अपने पदचिन्ह छोड़ता जा रहा है।

कुएँ पर पनघट सज गया है। रंग-बिरंगे घाघरे-ओढ़नी में सजी मारवाड़नें, जब पानी की मटकी भरती हैं तो उनकी चूड़ियों की खनक, इस शांत सुबह का सबसे मधुर संगीत बन जाती है।

यह दृश्य नहीं, मारवाड़ का आत्म-सम्मान है। यहाँ गरीबी में भी गौरव है, रेत में भी रस है।

ऐसी सुबह रोज नहीं उतरती, यह तो ईश्वर कभी-कभी मारवाड़ की धरती पर अपनी कलम से लिखता है।

लेखक –
नरसा राम जांगु

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
Click to listen highlighted text!
error: Content is protected !!