जहाँ गणेश, वहाँ सफलता निश्चित है। गणेश प्रथम पूज्य और विघ्नहर्ता : पंडित लोकेश झा

हिंदू धर्म में गणेश जी का स्थान अद्वितीय है। वे केवल पूजनीय देवता नहीं, बल्कि आस्था, ज्ञान और सफलता के प्रतीक हैं। हर शुभ कार्य की शुरुआत उनके स्मरण से होती है, इसलिए उन्हें प्रथम पूज्य कहा गया है।
स्कंद पुराण व नारद पुराण के अनुसार शिव-पार्वती ने गणेश जी को यह वरदान दिया कि संसार में सबसे पहले उनकी पूजा होगी। गणेश पुराण व मुद्गल पुराण में उन्हें विघ्नहर्ता और सिद्धिदाता कहा गया है। ऋग्वेद में गणपति “ब्रह्मणस्पति” के रूप में वर्णित हैं — वाणी, ज्ञान और प्रज्ञा के अधिष्ठाता। गणेश जी की सवारी मूषक है, जो चंचल मन और इच्छाओं का प्रतीक है। संदेश यही है कि विवेक और आत्मसंयम से ही सच्ची भक्ति संभव है। मुद्गल पुराण में गणेश जी के आठ स्वरूप बताए गए हैं । जीवन के हर पड़ाव में उनकी उपासना का महत्व समझाते हुए। वेदों में स्तुति : अथर्ववेद में रचित गणपति अथर्वशीर्ष सबसे प्रसिद्ध स्तुति है। इसमें कहा गया है।
“त्वं बुद्धिर्त्वं ज्ञानमत्वं सत्यं”
अर्थात् गणेश ही बुद्धि, ज्ञान और सत्य के अधिष्ठाता हैं। गणेश जी हिंदुओं के लिए विशेष हैं , क्योंकि वे हर शुभ कार्य के आरंभ के देवता हैं। वे विघ्नों का नाश करते हैं, सफलता और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं, और ज्ञान तथा विवेक प्रदान करते हैं। सचमुच, उनके पूजन से जीवन की कठिन राहें भी सरल हो जाती हैं। गणपति बप्पा मोरया मंगलमूर्ति मोरया




