बूंदों का मूल्य — कविता साव पश्चिम बंगाल

गर्मी इस बार कुछ ज़्यादा ही थी। गाँव के तालाब का पानी सूखने लगा था। किसान चिंतित थे, बच्चे उदास थे और पशु-पक्षी प्यास से तड़प रहे थे। इन्हीं दिनों गाँव के बाहर बने पुराने कुएँ के पास एक अजीब-सी हलचल दिखने लगी। हर सुबह कुछ बच्चे वहाँ इकट्ठा होकर अपने घरों से बचा हुआ पानी एक छोटे घड़े में जमा कर रहे थे।
यह सब पहल की थी आठ साल की रुपाली ने। उसने अपनी दादी से सुना था— “पानी की हर बूंद जीवन है।” बस उसी दिन से उसने तय कर लिया कि वह पानी बचाएगी और दूसरों को भी बचाना सिखाएगी।
शुरू में सबने उसका मज़ाक उड़ाया,
“अरे, दो–चार बूंदों से क्या फर्क पड़ने वाला है?”
रुपाली चुप रही, पर उसका प्रयास जारी रहा। धीरे-धीरे दो बच्चे, फिर पाँच बच्चे, और फिर पूरा मोहल्ला उसके साथ जुड़ गया। कुछ ही दिनों में घड़ा भरने लगा और उस पानी से गाँव के तालाब में एक छोटा-सा नाला बनाया गया।
बरसात आई तो तालाब फिर से लबालब भर गया। पर इस बार फर्क पानी से नहीं, सोच से पड़ा था। गाँव के लोगों ने समझ लिया कि बड़ी समस्या को छोटे-छोटे प्रयास ही मिलकर हल करते हैं।
रुपाली अब भी रोज पानी बचाती है। और जब कोई पूछता है,
“क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारी एक छोटी कोशिश दुनिया बदल सकती है?”
वह मुस्कुराकर जवाब देती है—
“दुनिया नहीं, पर मेरी दुनिया तो बदल ही जाती है।
संदेश,
बड़ी समस्याएँ भी छोटे-छोटे प्रयासों से हल होती हैं। हर व्यक्ति की भागीदारी महत्वपूर्ण है।
कविता साव
पश्चिम बंगाल




