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लेख: संस्कारविहीन होता समाज और नाम आधुनिकीकरण का — अनीता चतुर्वेदी

 

आज का समय तेज़ रफ्तार वाला है। जीवन के हर क्षेत्र में ‘आधुनिकीकरण’ और ‘नवीनता’ की गूंज सुनाई देती है। नए विचार, नए साधन, नए अवसर ..इन सबके बीच समाज जिस दिशा में आगे बढ़ रहा है, वह बाहरी रूप से आकर्षक अवश्य है, परंतु भीतर से कहीं न कहीं खोखलापन भी लिए हुए है। इस खोखलेपन की जड़ उस “संस्कारहीनता” में है जो धीरे-धीरे हमारे सामाजिक जीवन का हिस्सा बनती जा रही है।संस्कार वह आधार हैं जिन पर किसी भी समाज की सभ्यता और संस्कृति खड़ी होती है। यह सिर्फ धार्मिक आडंबर या परंपराओं की बंदिश नहीं, बल्कि जीवन जीने का संतुलित तरीका है। ये हमें सम्मान, सहानुभूति, संयम और कर्तव्यबोध सिखाते हैं। जब इन संस्कारों को केवल ‘पुरातनता’ कहकर त्याग दिया जाता है और उनकी जगह केवल आधुनिकता का नाम लिया जाता है, तो समाज का ताना-बाना बिखरने लगता है।आज की पीढ़ी तकनीकी रूप से दक्ष है, परंतु भावनात्मक और नैतिक धरातल पर कमज़ोर होती जा रही है। माता-पिता से संवाद कम होता जा रहा है, रिश्तों में औपचारिकता बढ़ती जा रही है और “मैं” की भावना “हम” की भावना पर भारी पड़ रही है। यदि यही प्रवृत्ति बढ़ती रही तो हमारे पास मशीनें तो होंगी, पर मानवीयता खो जाएगी।आधुनिकता अपने आप में बुरी नहीं है। वह आवश्यक है..क्योंकि समाज को प्रगति के लिए परिवर्तन चाहिए। परंतु समस्या तब पैदा होती है जब हम आधुनिकीकरण के नाम पर अपनी जड़ों से कट जाते हैं। बिना संस्कारों के आधुनिकीकरण वैसा ही है जैसे बिना नींव का मकान..ऊँचा दिखेगा, पर टिकेगा नहीं।हमें यह समझना होगा कि सच्ची प्रगति परंपराओं को तोड़ने में नहीं, बल्कि उन्हें नए संदर्भों में जीने में है। मोबाइल, इंटरनेट और ग्लोबलाइजेशन हमारे जीवन को सरल बना सकते हैं, लेकिन मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने वाली डोर सिर्फ संस्कार ही हैं।इसलिए ज़रूरत है कि हम अपने बच्चों को आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ मानवीय शिक्षा भी दें। उन्हें यह सिखाएँ कि सफलता केवल उपलब्धियों से नहीं, बल्कि व्यवहार और संवेदनशीलता से भी नापी जाती है। घर-परिवार से मिले संस्कार ही उन्हें सिखाएँगे कि आधुनिकता का अर्थ रिश्तों की दूरी नहीं, बल्कि सोच की व्यापकता है।संस्कार और आधुनिकता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। आधुनिकता हमें समय के साथ चलना सिखाती है और संस्कार हमें समय की परवाह किए बिना मानवीय बने रहना। यदि समाज को वास्तव में उज्ज्वल भविष्य देना है, तो हमें नाम मात्र की आधुनिकता से आगे बढ़कर संस्कारों से जुड़े हुए आधुनिकीकरण की राह अपनानी होगी।

अनीता चतुर्वेदी
(गौर सिटी
ग्रेटर नोएडा)

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