तृप्ति की तलाश — सुनीता तिवारी कहानी

सीमा हमेशा व्यस्त रहती थी
घर, परिवार और काम के बीच।
सब कुछ अच्छा था, लेकिन मन के भीतर एक खालीपन अक्सर उसे कचोटता था। लगता जैसे उसने सबके लिए जिया, लेकिन खुद के लिए कुछ नहीं किया।
एक दिन शाम को छत पर बैठी उसने आसमान की ओर देखा।
बादलों के बीच से झांकती सुनहरी किरण ने उसके दिल को छुआ।
उसने सोचा.
आख़िर मेरी तृप्ति कहाँ है?
अगले ही दिन उसने पुराने शौक़ को याद किया.
चित्रकारी।
बहुत वर्षों बाद उसने ब्रश उठाया।
जैसे ही रंग कागज़ पर बिखरने लगे, उसकी आँखों में चमक लौट आई।
हर रंग उसके भीतर के खालीपन को भर रहा था।
धीरे-धीरे उसने समझा कि तृप्ति बाहर नहीं, भीतर मिलती है।
जब इंसान अपने असली स्वरूप, अपने शौक़ और अपने सपनों को जीता है, तभी आत्मा तृप्त होती है।
उस दिन सीमा ने महसूस किया.
तृप्ति किसी बड़ी उपलब्धि में नहीं,
बल्कि उन छोटे-छोटे क्षणों में छिपी है,
जहाँ हम सच में स्वयं को जीते हैं।
सुनीता तिवारी




