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मां की करुण पुकार और कलयुग की हंसी– पुष्पा भाटी

संपादकीय

जोधपुर ज़िले से आया यह वीडियो हमारे समाज की आत्मा को झकझोर देता है।
एक ओर मां है — जिसने कोख में नौ महीने आग सी तपन झेली, अरमानों से बेटी को पाला, संस्कारों की माला में पिरोया।
और दूसरी ओर वही बेटी है — पुलिस के पहरे में, मित्र के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में हंसते हुए चली जा रही है।
मां की सिसकियाँ हवा में गूंजती हैं, पर बेटी के कानों तक पहुँचती ही नहीं।
क्या यही है आधुनिकता? क्या यही है “नया भारत”, जहाँ मां की ममता हंसी का तमाशा बन जाए?

संस्कार जब किताबों में रह जाएँ और दिलों से मिट जाएँ,
तो यही नज़ारा सामने आता है — मां की आंखों में लहू के आँसू और बेटी के चेहरे पर बेपरवाह मुस्कान।
जिस बेटी को लोरी सुनाकर सुलाया गया, वही अब माँ की करुण पुकार पर पत्थर बन गई।
यह केवल एक घर का दर्द नहीं, बल्कि युग की चेतावनी है — जब संस्कार टूटते हैं, तो समाज बिखरता है।

भारत की संस्कृति ने नारी को “देवी” कहा है —
पर देवी वही कहलाती है जो मर्यादा का दीप जलाए, न कि अपने ही घर के उजालों को बुझा दे।
आज की यह अंधी दौड़ “स्वतंत्रता” नहीं, बल्कि संस्कारों की हत्या है।
स्वतंत्रता का अर्थ कभी यह नहीं था कि माँ की गोद की गरिमा को रौंद दिया जाए।

अब वक्त है — समाज और सरकार दोनों को जागने का।
लिव-इन जैसी पश्चिमी प्रथाओं पर न सिर्फ़ सख़्त कानून बने, बल्कि स्कूलों और परिवारों में संस्कारों की शिक्षा को फिर से जीवन का हिस्सा बनाया जाए।
क्योंकि बेटियां सिर्फ़ पढ़ाई से नहीं, संस्कारों से ऊँची उठती हैं।

जितना भी ऊँचा महल बना लो, उसकी रौनक उन्हीं से होती है
जो माँ के चरणों की मिट्टी को तिलक बनाकर माथे पर लगाती हैं।

मां रोती रही…
बेटी हंसती रही…
और कलयुग अपने पूरे शोर में हमें याद दिलाता रहा —
“जब ममता की चीखें अनसुनी हो जाएं, तो सभ्यता खतरे में होती है।”

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