विषय बुजुर्गों की सीख– राजेन्द्र परिहार “सैनिक”

(संस्मरण)
बुजुर्गों_की_सीख जरूर मान लेना चाहिए, वरना तो पछताना ही पड़ता है जीवन में। बुजुर्गों की सीख उनके जीवन अनुभवों का निचोड़ है, जो कि जीवन में सदा उपयोगी होता है।
बात बहुत पुरानी है जब हम बच्चे थे। बचपन भी तब आजकल की तरह पाबंदियों से मुक्त हुआ करता था। एक बार हम तीन चार दोस्तों ने खेलते खेलते ही विचार किया कि चलो यार कमलेश्वर शिव मंदिर चलते हैं और हम चारों दोस्त बिना किसी को बताए कमलेश्वर की यात्रा पर निकल पड़े। कमलेश्वर शिव मंदिर हमारे
गांव से तीन कोस पर स्थित प्राचीन कालीन मंदिर था। परिवार के साथ कई बार यात्रा भी की थी बस से गये थे।आज हम सब दोस्त पैदल ही यात्रा पर निकल पड़े, ये भी नहीं सोचा कि भूख लगेगी तो कहां क्या खाएंगे और प्यास लगेगी तो कहां पानी पिएंगे नादान की दोस्ती जी का जंजाल। जोश जोश में चल दिए सुबह का वक्त था सो निर्विघ्न पहुंच गए कमलेश्वर शिव मंदिर। मंदिर में दर्शन किए,मौज मस्ती की,औ दोपहर में ही वहां से वापस रवाना हो गए।इतनी लंबी यात्रा कभी नहीं की थी लिहाजा थकान भी हो चुकी थी, फिर भी चलते रहे। भूख भी सताने लगी थी और गर्मी के कारण प्यास भी सताने लगी थी।भूख का प्रबंध तो हो गया, रास्ते में बैर की झाड़ियों से बैर खा लिए, बरगद के पेड़ से गूलर खा लिए, किंतु पानी बिना शरीर भी शिथिल होने लगे।गला सूखने लगा और शरीर बेजान सा हो चला था। आगे बढ़ना मुश्किल हो रहा था। रास्ते में एक बुजुर्ग व्यक्ति मिल गये और हमारी हालत देखकर सारा माजरा समझ गये उन्होंने हमें कहा
कि बेटा कहीं दूर की यात्रा करनी हो तो भोजन और पानी की व्यवस्था अपने साथ लेकर चलना चाहिए। उन्होंने हमें बरगद की छांव में बिठाकर कुछ रोटियां और चटनी खाने को दी, पानी पिलाया। अब कुछ राहत महसूस हुई तो उन्होने हमें एक रस्सी और लोटा (पानी का बर्तन) देते हुए कहा कि रास्ते में प्यास लगे तो किसी कुंए से इसके जरिए पानी निकाल कर पी लेना।
यह सीख देकर वो अपने गंतव्य पर चल दिए और यह भी सीख दे गए कि दिन रहते रहते अपने घर पहुंच जाना वरना अंधेरा घिरने पर जंगली जानवरों का भी खतरा हो सकता है। हमने उनकी सीख का पूरी तरह पालन किया और शाम ढलने से पहले अपने घर पहुंच गए। घर पहुंचने पर पिटाई भी हुई, किंतु उन बुजुर्ग की सीख हमने गांठ बांध ली कि कहीं भी जाने से पहले यात्रा में आने वाली परेशानियों से बचने के लिए स्वयं की व्यवस्था अवश्य होनी चाहिए।
राजेन्द्र परिहार “सैनिक”




