छठ व्रत कथा — कविता साव

सूर्य उपासना का महापर्व छठ भारतीय आस्था, पर्यावरण और संयम का अद्भुत संगम है। यह पर्व केवल पूजा नहीं, बल्कि मानव और प्रकृति के मध्य एक गहन संवाद है।
प्रातःकालीन अरुणिमा जब गंगा या सरोवर की लहरों पर झिलमिलाती है, तब छठव्रती स्त्रियाँ उपवास, पवित्रता और आत्मबल की प्रतिमूर्ति बनकर खड़ी होती हैं — यह दृश्य आस्था की दिव्य रेखा खींच देता है।
छठी मइया की कथा बताती है कि सूर्य ही जीवन के स्रोत हैं, और कृतज्ञता का सबसे सुंदर रूप “अर्घ्य” है। कहा जाता है कि राजा प्रियव्रत के यहाँ संतान न होने पर, देवी छठी के वरदान से पुत्र प्राप्त हुआ। तब से यह व्रत संतान-सुख, आरोग्य और समृद्धि की कामना में किया जाने लगा।
यह कथा सिखाती है कि भक्ति और श्रद्धा से असंभव भी संभव बनता है।
चार दिनों के इस व्रत में संयम, स्वच्छता और निस्वार्थता का अद्भुत अनुशासन होता है। छठव्रती बिना जल के भी निरंतर आराधना करते हैं — यह तपस्या मानव के आंतरिक बल और श्रद्धा की ऊँचाई को रेखांकित करती है।
छठ व्रत हमें यह सिखाता है कि
जीवन में प्रकाश फैलाना है तो पहले स्वयं को शुद्ध करना होगा। प्रकृति से जुड़ना ही सच्चा आध्यात्म है। संयम, श्रम और श्रद्धा ही सफलता के तीन स्तंभ हैं।
जब अस्त होते और उदित होते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है, तो यह केवल सूर्य का नहीं, बल्कि मानव जीवन की निरंतरता और आशा का अभिनंदन होता है।
छठ पर्व हमे यह संदेश देता है कि “यदि आस्था गहरी हो तो जीवन का हर अंधकार मिट जाता है।”
कविता साव
पश्चिम बंगाल




