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विवाह में फ़िज़ूलखर्ची कहाँ तक उचित है.. अलका गर्ग,गुरुग्राम

 

मेरे विचार से इस विषय पर तो शायद ही कोई समझदार व्यक्ति सहमत होगा कि विवाह संस्कार में बेफ़िज़ूल खर्च करना सही है।
सिर्फ़ और सिर्फ़ झूठी धन और दिखावे के अलावा ये और कुछ भी नही।अक्सर वर पक्ष की तरफ़ से सुनने में आता है कि दहेज हम नही लेंगे पर शादी ख़ातिर मिलनी दावत सजावट बहुत अच्छी होनी चाहिए ।कन्या पक्ष ख़ुश हो कर कि हमें दहेज नही देना पड़ रहा है ,अपनी पूरी ताक़त अन्य ख़र्चों में लगा देता है जो कि दहेज कि रक़म के बराबर ही बैठ जाती है।
फिर आज की युवा पीढ़ी के मन में यह सोच कि शादी तो एक बार ही होती है तो कोई कमी नही रहनी चाहिए,और भी फ़िज़ूलखर्ची करा देती है।
इवेंट मनेजमेंट वालों ने तो लुभावने ऑफ़र दे दे कर इतना मज़बूत जाल फैलाया हुआ है कि दुल्हा दुल्हन उसमें फँस ही जाते हैं और सबसे बड़ी फ़िज़ूलख़र्ची यही है।
दावत में कुल मिला कर सौ तरह के व्यंजन आजकल आम है।किसी भी देश में इतना खाना कचरे में जाना क्या उचित है ?पैसा भले ही पैसेवाले खर्च कर रहे हैं पर संसाधन तो अपने देश के बर्बाद रहे हैं न …! समझ में नहीं आता ये हद कहाँ जा कर रुकेगी।
पहले जैसी आत्मीयता से भरपूर शादियाँ ख़त्म होती जा रहीं हैं।मिलजुल कर काम,गाना बजाना, रहने की व्यस्था करना,घरातियों का भोजन बनाना,बड़ी,मंगौड़ी,पापड़,
अचार,सजावट सब काम घर के सदस्य, रिश्तेदार और पड़ोसी मिल कर कर लेते थे।अब ये सारे काम होटल,केटरर,पार्लर,डिज़ाइनर ने ले लिए हैं।शादी का मांगलिक कार्य भी चलता फिरता चलचित्र जैसा लगता है।
कुल मिला कर शादी में बेफ़िज़ूल का खर्च तो बिल्कुल भी सहमति के क़ाबिल नहीं है ।

अलका गर्ग,गुरुग्राम

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