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कलियुगी औलाद — माया शर्मा

मेरी अंगुली पकड़कर चलने वाले,
आज मुझे सही रास्ता बताते हैं।
मुझे क्या करना है और कैसे करना है?
इसका वो मुझे सलीका सिखाते हैं।
कहाँ जाना है क्या पहनना है,
ये आकर मुझको बताते हैं।
कुछ गलती कर दूँ तो सरे आम,
मुझे आँखें दिखाते हैं।
मेरी कमाई पर मेरा हक नहीं,
अब वो मौज उड़ाते हैं।
दो निवाले हमें खिला कर,
हम पर अहसान जताते हैं।
अरे श्राद्ध में खीर पशर्मा जिमाने वाले,
जीते -जी मुझे खून के आँसू रुलाते हैं।
*माया शर्मा*




