लघु कथा: दिनेश की दिवाली — पालजीभाई वी राठोड़ ‘प्रेम

एक छोटा सा गांव था। इस गांव में दिनेश नाम का एक नाम का लड़का रहता था।बहुत ही खुशमिजाज वाला लड़का था। लेकिन जब दिवाली नजदीक आ रही थी वह गुमसूम रहने लगा था।छोटा सा मगर गरीब परिवार था।मां और छोटी बहन।पिताजी के चले जाने के बाद सभी जवाबदारी माता की सिर आ गई थी।उनकी उम्र छोटी थी लेकिन जवाबदारी और अनुभवों ने उसे समय से पहले बड़ा बना दिया था। दिनेश की मां लोगों के घरों में झाड़ू पौंछा बर्तन साफ करने का काम करती थी। खेत में भी काम करने जाती थी।उसमें से उसका गुजारा चलता था।
हर वर्ष जब पूरा गांव दिवाली की रोशनी से जगमगा रहता था उस समय दिनेश का घर अंधेरे में डूबा रहता था।गांव के सभी घरों में तरह तरह के पकवान मिठाईयां बनती थी। बच्चों बुढें जवान सभी नए नए कपड़े पहन कर पटाखे से दिवाली मनाते थे।एक तो गरीबी और पिता की याद दिनेश दिवाली कैसे मनाए।
दिनेश का दोस्त कल्पेश बहुत समझदार था।दिवाली के दिन उसका मित्र कल्पेश दिनेश के घर आया। दिनेश की स्थिति देखकर वो समझ गया दिनेश को पिताजी की याद सताती थी।आज दिवाली के दिन ही दिनेश के पिताजी इस दुनिया से चल बसे थे। कल्पेश ने कहां;’ मित्र,मैं समझ सकता हूं तुझे पिताजी की याद आती है। मगर इस दुनिया में जो जन्म लेता है उसका मरण निश्चित है।’इस दुनिया में कोई अमर नहीं है। नाम उसका नाश। सभी को एक दिन दुनिया से जाना ही है। जो चलें गये उस का शोक करने से वह वापस तो नहीं जाएंगे। इसलिए उसका शोक करना व्यर्थ है । सबका मृत्यु निश्चित है। भूतकाल को भूलकर वर्तमान में जीना चाहिए। तुम्हारे लिए मा कितना काम करती है।तुम भी बड़ा होकर पिताजी का अधूरा सपना पूरा करो।मित्र, जिन के कंधों पर ज़िम्मेदारियों के बोझ हो।उन्हें रुठने और टूटने का कोई हक़ नहीं होता!दो परीक्षाएं जीवन मे अवश्य पास करना है
सुख मे विनम्रता की और दुःख में धैर्य की। कल्पेश की बात दिनेश की समझ में गई। कल्पेश ने ख्याल था इसलिए वह पटाखे लेकर आए थे।सबने मिलकर दिवाली मनाई।
जीवन में दोस्त भी ऐसा होना चाहिए जो दुःख में मदद करें। दर्द और गम से टपकते किसी की आंख से आंसुओं को खुशियों से आप्लावित छलकते आंसुओं में बदल देना ही इंसान होने का श्रेष्ठ प्रमाण है।
“उलझन चिंता बेकली है दुःख के आयाम,
एक हंसी वह शस्त्र है करें इन्हें नाकाम।
श्री पालजीभाई वी राठोड़ ‘प्रेम’
(सुरेंद्रनगर- गुजरात)




