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मेरे जज़्बात… सबक धीरे_धीरे सिखाती है जिंदगी.. अनीता चतुर्वेदी

 

ज़िंदगी कभी भी एक साथ अपनी परतें नहीं खोलती।
वह हमें दिन-ब-दिन, क़दम-दर-क़दम,
अनुभवों की कोमल और कभी-कभी कठोर उंगलियों से
धीरे-धीरे समझाती है कि असल में जीना क्या होता है।

पहली नज़र में दुनिया बहुत आसान लगती है..
मुस्कुराहटें बेफ़िक्र, रिश्ते सरल,
और सपने बस इशारे भर से पूरे हो जाने वाले।
लेकिन जैसे-जैसे वक़्त हमें थामकर
जीवन के असली रास्तों पर ले चलता है,
हम महसूस करते हैं कि हर चमक जीवन को रौशन नहीं करती।
हर खामोशी सुकून की नहीं होती,
और हर अपना हमेशा अपना नहीं रहता।

हम गलतियों से सीखते हैं,
गिरकर उठने से हिम्मत पाते हैं,
और टूटकर ही सुख पाते है कला जुड़ने की।
धीरे-धीरे समझ आता है
कि हर दर्द हमें कुछ गढ़ता है,
हर इंतज़ार हमें कुछ सिखाता है,
और हर खोया हुआ पल
हमें किसी नए अर्थ से भर देता है।

उम्र बढ़ने के साथ ये एहसास भी गहरा होता है
कि बातचीत करना जितना ज़रूरी है,
उतना ही ज़रूरी है चुप रहकर सुनना।
हर बात का जवाब ज़रूरी नहीं,
कभी-कभी सिर्फ़ साथ होना ही काफी होता है।

ज़िंदगी हर वक्त सहलाती नहीं,
कभी कभी धक्का देकर,और कभी
धीरे से कंधा पकड़कर समझाती है।
कौन हमारा है,
कौन बस राहगीर,
किसे थामना है,
और किसे जाने देना है।

और एक दिन, अचानक से नहीं,
बहुत धीरे_धीरे से हम जान लेते हैं..
कि सरलता सबसे बड़ी सुंदरता है,
शांति सबसे बड़ा धन,
और संतोष सबसे गहरा सुख।

ज़िंदगी की किताब का हर पन्ना
समय पर ही खुलता है,
यूं ही एकदम नहीं,
धीरे-धीरे समझ आती है फिर हमें ज़िंदगी।

अनीता चतुर्वेदी

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