वह लड़की — लता शर्मा
संस्मरण
थोड़ी पुरानी किंतु साफ सुथरे जिंस- शर्ट पहने कान तक कटी बाल वाली करीब बीस साल की सांवली सी वह लड़की ट्रेन डिब्बे में दरवाजे के पास बहुत देर से खड़ी थी,कभी बाहर तो कभी लोगों को देखते कुछ चिंतित सी।
मुझसे नज़र मिली तो मैं स्वभाव वश मुस्कुरा दी वो झेंप सी गई मैंने बगल वाली सीट के तरफ इशारा किया वो चुपचाप आकर बैठ गई जेब से मोबाइल निकाल देख मुस्कुराती , मैंने ध्यान से देखा मोबाइल बंद स्क्रीन में कुछ नहीं तो मैंने उससे पूछ लिया यह तो बंद है फिर क्या देख रही हो वो उदास हो गई मैंने पूछा कहां जा रही उसके आंख भर आई जेब से एक पुराना मुड़ा कागज निकाल मुझे थमा दी जिसमें दीदी को उसने … मुझे भी …पापा हम बूरे नहीं लिखा था।
मैंने उससे बहुत पूछा क्या हुआ था कौन है पापा कहां रहते हैं उसने कुछ न बताया मुझे उसपर बहुत तरस आ रहा था पर कुछ कर नहीं सकती थी। मैंने पूछा भूख लगी है वो चुप रही मैंने दो समोसे और चार केले एक पानी बाटल उसे दिए, चुपचाप समोसे खाने लगी ।कुछ देर को मै आँखे बंद कर उसके साथ क्या हुआ होगा , क्या पिता ने उसे घर से बाहर किया आदि सोचने लगी एक स्टेशन आया और वह उतर गई । मगर मेरे मन में एक प्रश्न छोड़ गई जो अक्सर मुझे उसके बारे में जानने को उत्प्रेरित करता है जो असंभव है जाने कौन थी वह। मैं जब भी उस स्टेशन से गुजरती हूं मेरी नज़र उसे ढूंढ़ती हैं पर वह नजर नहीं आती।
लता शर्मा तृषा




