संस्मरण — गणतंत्र दिवस : मेरे मन का तिरंगा — कविता साव पश्चिम बंगाल

गणतंत्र दिवस आते ही मेरे भीतर कहीं बहुत गहराई में कुछ जाग उठता है। जैसे स्मृतियों की कोई पुरानी संदूक खुल जाती हो। जनवरी की ठिठुरती सुबह, माँ के हाथों की गर्म चाय, और आँगन में धीरे-धीरे लहराता तिरंगा—इन सबके बीच मेरा बचपन आज भी साँस लेता है।
विद्यालय की उस प्रार्थना सभा में खड़ी छोटी-सी मैं, जब राष्ट्रगान गाती थी, तो शब्दों से ज़्यादा मेरी आँखें भर आती थीं। शायद तब मैं यह नहीं जानती थी कि संविधान क्या है, गणराज्य क्या होता है,पर यह ज़रूर जानती थी कि यह ध्वज मेरे अपनेपन का प्रतीक है। उस पल मुझे लगता था, जैसे यह देश मुझे अपनी गोद में लेकर कह रहा हो,“तू मेरी बेटी है।”
परेड देखते समय जब सैनिकों की दृढ़ चाल दिखाई देती, तो मन गर्व से भर उठता। झांकियों में सजी स्त्रियों को देख कर भीतर कहीं यह विश्वास जन्म लेता कि मैं भी इस देश की शक्ति हूँ,कमज़ोरी नहीं। पिता जी की आँखों में चमक और माँ की चुप मुस्कान,मुझे सिखा जाती थी कि देशप्रेम शब्दों से नहीं, संस्कारों से पनपता है।
आज, जब मैं बड़ी हो चुकी हूँ, गणतंत्र दिवस मुझे और भी भावुक कर देता है। एक स्त्री होने के नाते मैं तिरंगे के नीचे खड़ी होकर अपने अधिकारों को भी महसूस करती हूँ और अपनी जिम्मेदारियों को भी। कभी-कभी मन सवाल करता है,क्या मैं सच में स्वतंत्र हूँ? क्या मेरी आवाज़ उतनी ही सुनी जाती है? फिर संविधान की वह पंक्ति याद आती है,समानता, न्याय और गरिमा,और आँखें नम हो जाती हैं।
जब तिरंगा हवा में लहराता है, तो मुझे उसमें केवल केसरिया, श्वेत और हरित नहीं दिखते,मुझे अपनी माँ की उम्मीदें, अपने पिता का विश्वास और अपनी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य दिखता है। गणतंत्र दिवस मेरे लिए उत्सव से अधिक एक भाव है,जो मुझे बार-बार याद दिलाता है कि आज़ादी मिली है, लेकिन उसे सहेजना मेरी जिम्मेदारी है।
मेरे मन में गणतंत्र दिवस,एक बेटी का अपने देश से भावुक संवाद है।
कविता साव
पश्चिम बंगाल




