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खुशियों की डायरी — प्रवीणा सिंह राणा प्रदन्या

 

मेरी अलमारी के एक कोने में रखी वह छोटी-सी नीली डायरी, आज भी मेरे मन के सबसे उजले पन्नों को संजोए बैठी है। नाम भले ही “खुशियों की डायरी” था, पर दरअसल वह मेरे जीवन की छोटी-बड़ी मुस्कानों का संग्रहालय थी। जब भी मन भारी होता, मैं उसके पन्ने पलटती और जैसे कोई जादुई दरवाज़ा खुल जाता,मुझे फिर से अपने ही बीते दिनों में ले जाता, जहाँ हर याद में एक ताज़ा खुशबू बसी होती।

पहले पन्ने पर वह दिन दर्ज है, जब अचानक बरसात हुई थी और मैं भीगते हुए घर लौटी थी। माँ ने तौलिया लाकर मेरे बाल पोंछे, और मैंने हँसते हुए लिखा,“माँ के हाथों की गर्माहट ही सबसे सुकून देने वाली धूप है।” इस एक वाक्य में उस दिन की सारी खुशी समा गई थी।

एक और पन्ना है,मेरी पहली छोटी-सी जीत का। स्कूल में कविता पाठ प्रतियोगिता में मिला तीसरा स्थान। पदक छोटा था, पर खुशी बड़ी। मैंने लिखा था,“कभी-कभी तीसरा स्थान भी दिल में पहला लगता है।” आज भी वह लाइन पढ़कर होंठों पर मुस्कान आ जाती है।

कुछ पन्नों पर दोस्तों की शरारतें चिपकी हैं। एक दिन हमने किसी की नोटबुक में फूल बना दिए थे, और शिक्षक ने हम सबको बाहर खड़ा कर दिया। मैंने डायरी में लिखा,“सज़ा का वह आधा घंटा, दोस्ती को और गाढ़ा कर गया।”

डायरी में त्योहारों की महक भी है,दीयों की रोशनी, गुड़ की मिठास, नई चूड़ियों की खनक, और घरभर में फैलती ताज़े पकवानों की सुगंध। उन दिनों को यादकर मैंने लिखा था,”खुशियाँ कभी बड़ी नहीं होतीं, बस दिल में जगह बना लेती हैं।”

धीरे-धीरे डायरी मोटी होती गई, और मैं भी। जीवन की व्यस्तताओं ने लिखने की आदत छीन ली, पर यादों की महक वहीं ठहरी रही। अब भी जब मैं उसे खोलती हूँ, तो जैसे किसी पुराने मित्र से मिलती हूँ,जो शिकायत नहीं करता, बस चुपचाप मेरी ही आवाज़ मुझे वापस सुना देता है।

“खुशियों की डायरी” दरअसल एक किताब नहीं, मेरा अपना आईना है,जिसमें मैं अपने जीवन की उजली मुस्कानों को फिर से जी पाती हूँ। यह याद दिलाती है कि खुशियाँ ढूँढनी नहीं पड़तीं, बस महसूस करनी होती हैं। और कभी-कभी, छोटी-सी नीली डायरी भी पूरे जीवन को रोशन कर जाती है।

प्रवीणा सिंह राणा प्रदन्या

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