पूस की भयंकर रात– रमेश शर्मा

रवि कानपुर से पंद्रह किलोमीटर दूर महंगौरा गाँव में अपना घर छोड़कर जयपुर में नौकरी करने के लिए आया था। यहाँ उसके एक दूर के चाचाजी ने बुलाया था।
रवि के घर की माली हालत ठीक नहीं थी। पिता मजदूरी करते थे। और माँ किसी तरह घर गृहस्थी को चलाती थी। दो बड़ी बहन और वह घर में कुल पांच सदस्य थे। बहनें भी ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं थी। आठवीं के बाद गाँव में स्कूल नहीं था इसलिए पिता जी पढ़ने के लिए आगे नहीं भेजा।
मैंने किसी तरह बी ए पास किया था लेकिन कोई नौकरी नहीं मिल पा रही थी। घर की स्थिति को देखकर मुझे बहुत दुख होता था और मैं चाहता था कि किसी तरह पिता जी की आर्थिक मदद करूँ।
मैं चाचा जी का संदेश मिलते ही तुरंत जयपुर आ गया। यहाँ एक मल्टी स्टोरी बिल्डिंग में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी मिल गई। दस हजार रुपये और रहने के लिए छोटा सा स्टोर। लेकिन जरूरत थी इसलिए तुरंत जोइन कर ली। सोचा समय निकाल कर थोड़ा पढ़ाई करके किसी सरकारी नौकरी का कंपटीशन दे दूंगा। पैसे कमाने के लिए दोनों टाइम की नौकरी कर रहा था।
दिसम्बर माह में इस बार कड़ाके की ठंडा पढ़ रही थी। और एक पूरी बांह की जर्सी में सुबह से पूरी रात ड्यूटी देना कठिन काम था लेकिन घर वालों का ख्याल आते ही अपनी परेशानी भूल जाता था।
पच्चीस दिसंबर को पूस की रात भयंकर ठंड थी और हल्की बारिश भी हो गई। हाड़ कपकपाती ठंड में रात भर खुले में बैठना गेट पर आसान काम नहीं था। आज शाम को तबियत ठीक नहीं लग रही थी। शाम से बुखार चढ़ आया था। हमारी बिल्डिंग में क्रिसमस की पार्टी चल रही थी। बहुत तेज़ शोर शराबा था। उसी समय फ्लैट नं 105 वाले शर्मा अंकल बाहर जाकर आये उन्होंने हार्न बजाया गेट खोलने के लिए उठा लेकिन गिर पड़ा। वो तुरंत आये मेरी हालत देखकर मुझे डाक्टर के पास ले गए। दवाई दिलवा कर लाये और मुझे खाना घर से लाकर दिया। तथा एक मोटा कंबल लाकर मुझे आराम करने के लिए हिदायत दे गये।
सुबह छ:बजे आकर मेरा हाल पूछा। मेरी तबियत अब ठीक थी। मैंने उन्हें धन्यवाद दिया। आज उन्होंने मेरा जीवन बचाया।
रमेश शर्मा




