मैं अभागी स्वर्ण हूँ… सुनिता त्रिपाठी’अजय

मैं अभागी स्वर्ण हूँ,
मेहनत मेरी पहचान नहीं,
काबिलियत मेरी गलती बन जाए
ऐसा कोई संविधान नहीं।
77 साल आज़ादी को हो गए,
पर सवाल आज भी ज़िंदा है,
काग़ज़ों की बराबरी से ज़्यादा
हक़ का सच अब शर्मिंदा है।
मैंने जाति नहीं चुनी थी,
न जन्म के सौदे किए,
फिर क्यों मेरी मेहनत को
मेरी पहचान से तोल दिए?
अगर बाँटना ही है तो भूख के नाम पर बाँटो,
अगर देना ही है तो हालात को दो,
जिसके घर में रोटी नहीं
आरक्षण उसकी औक़ात को दो।
गरीबी देखो, आँकड़े देखो,
खाली थाली की सिसकी सुनो,
जाति की दीवार गिराकर एक बार
इंसान की ज़िंदगी चुनो।
आरक्षण ने सहारा दिया —
मैं इनकार नहीं करती हूँ,
पर पीढ़ियों तक वही लाभ लें
ये न्याय नहीं, मैं कहती हूँ।
आज भी वही कुर्सियाँ भरते हैं
जो कल भी मजबूत थे,
और जो सच में पिछड़े हैं
वो सिस्टम से आज भी लुटे हैं।
अब कानून बनते हैं काग़ज़ पर,
बिना ज़मीन का सच जाने,
UGC के नाम पर नियम लिखे गए
बिना छात्र की आग पहचाने।
सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई —
ये चेतावनी कम नहीं है,
न्याय अभी ज़िंदा है देश में
ये उम्मीद कम नहीं है।
ये सवाल है, साज़िश नहीं,
ये आवाज़ है, विद्रोह नहीं,
हक़ माँगना देशद्रोह नहीं
ख़ामोशी ही सबसे बड़ा अपराध सही।
अब जाति नहीं, आर्थिक आधार चाहिए,
अब नाम नहीं, न्याय का माप चाहिए,
अब नीति नहीं, नीयत चाहिए
इस देश को सच का साथ चाहिए।
मैं अभागी स्वर्ण हूँ,
पर बेआवाज़ नहीं हूँ,
लिखूँगी, बोलूँगी, लड़ूँगी
क्योंकि मैं अब भी सवाल हूँ।
सुनिता त्रिपाठी’अजय




