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साहित्य की जिम्मेदारी — कविता साव पश्चिम बंगाल

 

साहित्य को केवल सौंदर्य की वस्तु या भावनात्मक पलायन का साधन मानना उसकी सामाजिक भूमिका को सीमित करना है। साहित्य उस समाज से जन्म लेता है, उसी की विसंगतियों, संघर्षों और प्रश्नों से पोषित होता है। जब समाज अन्याय, असमानता और भय से जूझ रहा हो, तब साहित्यकार का मौन स्वयं एक पक्ष बन जाता है।
हस्तक्षेप का अर्थ नारे लिखना नहीं है, बल्कि उन सच्चाइयों को उजागर करना है जिन्हें सामान्य बना दिया गया है। साहित्य का काम है प्रश्न खड़े करना—उन स्थितियों पर, जिन्हें अपरिवर्तनीय बताकर स्वीकार करा लिया गया है। प्रेम और पीड़ा भी तब राजनीतिक हो जाते हैं, जब वे सत्ता और बाज़ार द्वारा तय किए गए मूल्यों को अस्वीकार करते हैं।
जो साहित्य केवल प्रशंसा, पुरस्कार और अकादमिक स्वीकृति के लिए रचा जाता है, वह व्यवस्था के लिए सहज और सुरक्षित हो जाता है। इसके विपरीत, जो साहित्य असहज करता है, असहमति को स्वर देता है और स्थापित दृष्टियों को चुनौती देता है—वही समाज की चेतना को आगे बढ़ाता है।
यह भ्रम कि साहित्य तटस्थ हो सकता है, दरअसल प्रभुत्वशाली दृष्टि को सामान्य ठहराने का तरीका है। हर रचना किसी न किसी सामाजिक पक्ष से जुड़ी होती है। साहित्यकार का दायित्व उपदेश देना नहीं, बल्कि यह दिखाना है कि जिसे स्वाभाविक कहा जा रहा है, वह ऐतिहासिक है—और बदला जा सकता है।
आज के समय में साहित्य की प्रासंगिकता इसी में है कि वह चुप्पी को तोड़े और समाज को अपने ही प्रश्नों से रूबरू कराए।
कविता साव
पश्चिम बंगाल

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