आलेख — बजट देखा, तब समझ में आया—यहीं पर शून्य क्यों खोजा गया था –कविता साव पश्चिम बंगाल

भारतीय दर्शन में शून्य केवल अभाव नहीं है, वह संभावना भी है। गणित में शून्य खोजा गया ताकि गणना पूरी हो सके, और जीवन में शून्य स्वीकारा गया ताकि संतुलन बना रहे। पर जब आज का बजट सामने आता है, तब शून्य का अर्थ बदलता हुआ दिखता है—यहाँ शून्य अब दर्शन नहीं, व्यवस्था की रिक्तता बनकर खड़ा है।
बजट को राष्ट्र की प्राथमिकताओं का आईना कहा जाता है। पर इस आईने में झाँकते ही सबसे पहले जो दिखता है, वह है—आम आदमी की जेब का खालीपन। महँगाई के आँकड़े बढ़ते हैं, पर राहत शून्य के आसपास भटकती है। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार जैसे बुनियादी मुद्दे भाषणों में तो स्थान पाते हैं, पर ज़मीन पर उनके हिस्से में अक्सर शून्य ही आता है।
किसान के हिस्से में उम्मीदें आती हैं, पर लाभ का हिसाब शून्य पर ठहर जाता है। युवा रोजगार की पंक्ति में खड़ा रहता है, पर नियुक्तियों का योग शून्य से आगे नहीं बढ़ता। मध्यम वर्ग कर देता है, पर कर-सुविधाओं का प्रतिफल शून्य जैसा महसूस होता है। तभी तो बजट देखते हुए यह सवाल उठता है—क्या शून्य सचमुच इसी दिन के लिए खोजा गया था?
शून्य की खोज ने मानव सभ्यता को गणितीय शक्ति दी थी, पर आज वही शून्य नीति-निर्माण की कमजोरी का प्रतीक बनता जा रहा है। विकास की बड़ी-बड़ी संख्याओं के बीच जब आम नागरिक अपने जीवन का हिसाब लगाता है, तो अंत में जो बचता है, वह अक्सर शून्य ही होता है—न बचत, न सुरक्षा, न संतोष।
यह आलेख बजट का मात्र विरोध नहीं है, बल्कि चेतावनी है। शून्य यदि हर वर्ग के जीवन में स्थायी हो जाए, तो विकास की सारी संख्याएँ अर्थहीन हो जाती हैं। शून्य का सही स्थान गणित की शुरुआत में है, नागरिक की थाली में नहीं।
शायद अब समय आ गया है कि बजट बनाते समय शून्य को प्रतीक नहीं, संकेत माना जाए—संकेत कि जहाँ-जहाँ शून्य दिख रहा है, वहाँ नीति को फिर से गढ़ने की ज़रूरत है। क्योंकि जिस दिन बजट देखने पर शून्य नहीं, संतुलन दिखाई देगा, उसी दिन शून्य की खोज सार्थक कहलाएगी।
कविता साव
पश्चिम बंगाल




