मेरी साहित्यिक यात्रा — सुनीता तिवारी

संस्मरण
शब्दों से मेरा परिचय बहुत सहज था, जैसे बचपन में माँ की लोरी से पहली बार स्वर का स्पर्श हुआ हो। अक्षरों की दुनिया मुझे हमेशा आकर्षित करती रही।
जब स्कूल की कॉपी के अंतिम पन्नों पर मैं चुपके-चुपके कुछ पंक्तियाँ लिखती थी, तब नहीं जानती थी कि यही चुप्पी आगे चलकर मेरी पहचान बनेगी।
विद्यालय में कबीर और तुलसी के दोहे पढ़ते-पढ़ते मन में भावों की पहली हलचल हुई।
फिर एक दिन पुस्तकालय में मुझे महादेवी वर्मा की कविताएँ मिलीं।
उनके शब्दों की करुणा और कोमलता ने मुझे भीतर तक छू लिया।
लगा जैसे मेरे अपने अनकहे भाव किसी और की कलम से व्यक्त हो रहे हों।
उसी क्षण मैंने निश्चय किया कि मैं भी अपने मन की बात कागज़ पर उतारूँगी।
तभी स्कूल के वार्षिकोत्सव में अध्यापिका जी ने स्वरचित कविता पढ़ने को बोला।
जब मैने पहली बार अपनी पंक्तियां पंछी के पंख शीर्षक से पढ़ी तो बहुत सराहना मिली।
पुरस्कार और प्रमाणपत्र भी मिला इसके बाद तो लिखने में मन लग गया।
मेरी चार,आठ लाइन की कविता दैनिक जागरण में छपने लगी और मेरा आत्म विश्वास जागा।
फिर
कॉलेज के दिनों में मंच से जुड़ने का अवसर मिला। दूसरी बार भी जब कविता-पाठ के लिए मंच पर गई, तो आवाज़ काँप रही थी।
पर जैसे ही अपनी रचना पढ़नी शुरू की, आत्मविश्वास का एक नया सूर्योदय हुआ।
श्रोताओं की तालियों ने मुझे यह विश्वास दिलाया कि मेरी लेखनी केवल मेरे लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए भी है।
धीरे-धीरे मैंने जीवन के विविध पक्षों पर लिखना शुरू किया
माँ की ममता, नारी की पीड़ा, समाज की विसंगतियाँ और प्रकृति की छवियाँ।
कभी-कभी निराशा भी हुई, जब रचनाएँ प्रकाशित नहीं हुईं या अपेक्षित सराहना नहीं मिली।
पर तभी मुझे रामधारी सिंह दिनकर की ओजस्वी पंक्तियाँ याद आईं, जिन्होंने सिखाया कि संघर्ष ही सृजन का मूल है।
समय के साथ साहित्य मेरे लिए केवल शौक नहीं, साधना बन गया।
शब्दों में मुझे मुक्ति मिली, आत्म-अभिव्यक्ति मिली और जीवन को देखने का नया दृष्टिकोण मिला।
आज जब पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो लगता है कि यह यात्रा अभी अधूरी है क्योंकि हर नया अनुभव एक नई रचना को जन्म देता है।
मेरी साहित्यिक यात्रा ने मुझे सिखाया है कि लेखन केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समाज से संवाद है।
यह एक ऐसा दीपक है जो स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देता है।
और मैं चाहती हूँ कि यह दीपक यूँ ही जलता रहे,जब तक शब्दों की सांसें मेरे भीतर जीवित हैं और आँखे साथ दें।
सुनीता तिवारी




