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वो होली — प्रवीणा सिंह राणा “प्रदन्या

 

होली का नाम लेते ही मन जैसे बरसों पीछे लौट जाता है,अपने गाँव की उन गलियों में, जहाँ फागुन की हवा में ही रंग घुला रहता था। सुबह होते ही ढोलक की थाप और “होरी खेलें रघुवीरा” की तान कानों में पड़ती, और हम सब बच्चे घरों से ऐसे निकल पड़ते जैसे किसी युद्धभूमि में जा रहे हों,पर यह युद्ध था हँसी का, अपनत्व का, रंगों का।
हमारे आँगन में माँ सुबह-सुबह गुजिया तलतीं, और उनकी खुशबू पूरे घर में फैल जाती। उधर पिताजी बड़े जतन से टेसू के फूलों का रंग घोलते। वह कहते—“रंग ऐसा हो जो त्वचा ही नहीं, मन को भी रंग दे।” तब कहाँ पता था कि सच में वही दिन जीवन को सबसे गहरे रंग देंगे।
गाँव के चौपाल पर दोपहर तक रंगों की धूम मच जाती। कोई गुलाल से चेहरा लाल कर देता, तो कोई हरे रंग में भिगो देता। और फिर आती भंग की बारी। बड़े-बुज़ुर्ग ठंडाई में भंग घोटते, और हम बच्चे कौतूहल से देखते रहते। थोड़ी ही देर में उनका ठहाका आसमान छूने लगता। कोई बेसुरी फाग गाने लगता, कोई पुरानी प्रेमकथा सुना बैठता। उस दिन मानो हर संकोच, हर शिकायत रंगों में धुल जाती थी।
मुझे याद है, एक बार चाचा जी ने ज़िद कर मुझे भी ठंडाई का गिलास पीने को दे दिया और भांग से बने पकौड़े खिला दिए । पर उसके बाद जो चक्कर आया, वह आज भी हँसी दिला देता है। पूरा आकाश जैसे घूम रहा था और मेरी हंसी बंद नहीं हो रही थी। मैं हंसे जा रही थी अपनी ही धुन में मस्त होकर।सबके चेहरे रंगों के इंद्रधनुष बन गए थे। उस दिन समझ आया कि होली केवल रंगों का नहीं, अनुभवों का भी उत्सव है।
शाम को जब सब थककर लौटते, तो चेहरों पर रंगों की परतें और आँखों में संतोष की चमक होती। न जाने कितनी दूरियाँ उस एक दिन में मिट जातीं। जिनसे साल भर बात न हुई हो, वे भी गले लगकर कहते,“बुरा न मानो होली है!”
आज कल की होली में वह अपनापन कम दिखता है, पर यादों की पोटली में सहेजे वे दिन अब भी उतने ही चमकीले हैं। होली के वे रंग, भंग के संग, केवल देह पर नहीं चढ़े थे,वे जीवन पर चढ़ गए थे।
अब जब भी फागुन आता है, मन फिर उसी चौपाल में पहुँच जाता है, जहाँ रंग उड़ते थे, भंग घुलती थी, और रिश्ते नए सिरे से खिल उठते थे। सच पूछिए तो होली का असली रंग वही था,सादगी का, हँसी का, और अपनत्व का, जो हमारे सारे गिले शिकवे मिटाकर कर हमें प्रेमरंग में भीतर तक भिगो देता था।

प्रवीणा सिंह राणा “प्रदन्या

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