यादग़ार होली — राजेन्द्र परिहार सैनिक

होली का नाम आते ही मन रंगों, हँसी और अपनत्व की मीठी स्मृतियों में डूब जाता है। जीवन में कई होलियाँ आईं और चली गईं, पर बचपन की एक होली आज भी मन के आँगन में सजी हुई है।
वह समय था जब होली केवल रंगों का नहीं, रिश्तों का त्योहार हुआ करती थी। होली से कई दिन पहले ही घर में तैयारियाँ शुरू हो जाती थीं। माँ गुजिया, मठरी और मालपुए बनातीं, जिनकी खुशबू पूरे घर को महका देती थी। हम बच्चे पिचकारी और रंगों की जिद करते और नई पिचकारी मिलते ही मानो त्योहार शुरू हो जाता। होली की सुबह सूरज निकलने से पहले ही मोहल्ले में बच्चों की टोली तैयार हो जाती। कोई गुलाल लेकर आता, कोई रंग भरी बाल्टी।
चेहरे पहचान में नहीं आते, पर हँसी सबको पहचान देती थी।
बड़े-बुजुर्ग भी नाराज़ होने का अभिनय करते, फिर खुद ही रंग लगा देते और आशीर्वाद देते,सदा खुश रहो।
सबसे सुंदर पल तब आता जब गिले-शिकवे भूलकर लोग एक-दूसरे के घर जाते।मिठाइयाँ बाँटी जातीं, ढोलक की थाप पर फाग गाए जाते और पूरा वातावरण प्रेम से भर उठता।
उस दिन न कोई छोटा होता, न बड़ा सब केवल अपने होते थे।शाम होते-होते थका शरीर और रंगों से भरा चेहरा आईने में देखकर मन अजीब संतोष से भर जाता था। आज समय बदल गया है, रंगों की जगह मोबाइल कैमरों ने ले ली है, पर उस सादगी भरी होली की यादें आज भी दिल को रंगीन बना देती हैं।
सच ही है कुछ त्योहार बीत जाते हैं, पर उनकी यादें जीवन भर मन को रंगती रहती हैं। वही होली मेरे जीवन की सबसे यादगार होली बन गई।
राजेन्द्र परिहार सैनिक




