अंतराष्ट्रीय महिला दिवस — अशोक पटसारिया नादान

हे जननी तूँ है सृजन हार,
तूँ है करुणा का चित्र हार।
तूँ असह वेदना की वाहक,
माँ के आँचल का सिर्फ प्यार।।
तूँ वात्सल्य का अजस्र स्त्रोत,
तेरी ममता पर जाँ निसार।।
तेरे खाते में लिखे गए,
हैं किलकारी के कीर्तिमान।।
तुमको प्रणाम शत-शत प्रणाम।।
हे वंदनीय तुम पूज्यपाद,
हम तुम्हें खिला खाते प्रसाद।
बनकर कन्या जिस घर आती,
उस घर के मिट जाते प्रमाद।।
जो करता कन्यादान तेरा,
सुन लेते हैं प्रभु आर्तनाद।
सबका मंगल करने वाली,
तूँ कल्याणी सबसे महान।।
तुमको प्रणाम शत-शत प्रणाम।।
हे वनिता तूँ घर की शोभा,
आँगन में तुझसे किलकारी।
तुमसे रहती घर में रौनक,
है पूर्ण पुरुष जब है नारी।।
तेरी आँखों के सागर में,
जो डूब गया सब पर भारी।
तू करुणा की सागर माता,
हैं प्रेम स्वयं तूँ मूर्तमान।।
तुमको प्रणाम शत-शत प्रणाम।।
हे नारी केवल श्रद्धा तुम,
मर्यादा धीरज वाली हो।
जो अस्मत से खेले कोई,
रणचंडी हो तुम काली हो।।
संकट के बादल छायें तो,
तुम रानी झांसी वाली हो।
है आज वही जीवित जग में,
जिसने पाया है अभयदान।।
तुमको प्रणाम शत-शत प्रणाम।।
हे शक्ति स्वरूपा रणचंडी,
तुमने जीवन की जंग जीत।
हिमगिरि पर झंडा गाड़ दिया,
सागर तल भी बन गया मीत।।
तुम सेना में ले गगनयान,
दुशमन को करती भयाभीत।
नादान चंद्र से मङ्गल तक,
नारी ने अब भरली ‘उड़ान’।।
तुमको प्रणाम शत-शत प्रणाम।।
अशोक पटसारिया नादान




