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प्रकृति के प्रति मेरी अभिलाषा– सुमन दूबे साऊखोर बड़हलगंज गोरखपुर

जब गिरा इस धरा पर एक कोमल अनमोल बीज,
बड़े उत्साह से निकल कर
दो पत्ते कुछ ही हफ्तों में
अपने तन पर इठलाते
बहकते सर -सर करते
जीवन के सुंदर तान,
पवन के साथ मिलकर नृत्य करते,
उन सुकोमल तन पर
मेरा हृदय प्रफुल्लित होता,
हर रोज मैं उन्हें निहारती दुलराती उनके साथ ही अपना मन भी
मैं बहलाती,
प्रकृति की गोद में रहकर
जीवन का आनंद लेती,
ऐसा लगता मानो जीवन का अनमोल पल यही सिमट कर
रह जाऊं।
मैं प्रकृति की गोद में सर रखकर
सो जाऊं।
सुमन दूबे साऊखोर
बड़हलगंज गोरखपुर




