संक्षिप्त लेख: आधुनिकता की आड में लुप्त होते संस्कार — पालजीभाई राठोड़ ‘प्रेम’

आज के जमाने में आधुनिकता जीवन का पर्याय बन चुकी है। विज्ञान के कारण मनुष्य आगे बढ़ा है। सुविधा भी प्राप्त की है। साधन संपन्न बन गया है। इसका प्रभाव हमारे जीवन पर पड़ता है और पारंपरिक संस्कार धीरे धीरे लुप्त हो रहे हैं।मनुष्य आधुनिकता की ओर अग्रसर होते हुए अपने संस्कृति को जीवन मूल्यों को भूलते जा रहा है।
हमारी संस्कृति की पहचान हमारे संस्कारों है।सबसे पहले अपने माता पिता गुरु का सम्मान करना चाहिए। बड़ों का आदर सत्कार करना चाहिए। अतिथि देवो भव:। गृहस्थ धर्म का पालन करना चाहिए ।घर में नारी का मान सम्मान होना बहुत आवश्यक है। आज की पीढी ये सब पारिवारिक मूल्यों से विमुख हो रही है। आज आधुनिकता से ये सब परंपरा दूर होती दिखती है।
आधुनिकता को अपनाना कोई बुरी बात नहीं है। इसका सही अर्थ है विज्ञान और ज्ञान का समन्वय करके हमारे जीवन को सरल और उपयोगी बनाना चाहिए। परंतु हम आधुनिकता की आड़ में अपने संस्कारों को भूलते जा रहे हैं ये हमारी कमनशीबी है। आज के बच्चे बड़ों का आदर करना भूल रहे हैं। विलासता की ओर जा रहे हैं। पहले हम साथ में त्यौहार मनाते थे।आज पर्वो का महत्व कम हो रहा है। आडंबर दिखावा की बढ़ोतरी होती जा रही है।
हमारे संस्कार हमारे समाज की पहचान ही नहीं बल्कि आत्मा की शक्ति भी है। यदि संस्कार ही नहीं रहा तो आधुनिकता सार्थक नहीं होगी। यह खोखली बनकर रह जाएगी। नई पीढ़ी को यह समझना होगा कि विज्ञान हमें ऊंची उड़ान दे सकता है पर संस्कारों हमें सही दिशा देते हैं। हमारे मार्गदर्शक बनते हैं। भौतिक सुख क्षणिक है। अपने मूल्यें संस्कारों जीवन भर की पूंजी है। जिस तरह इंसानों के रंग रूप अलग अलग होते हैं वैसे ही उनका नेचर अलग होता है।किसी की बात को दिल पर मत लीजिए जिसका जैसा संस्कार होता है उसका वैसा ही व्यवहार होता है।सदैव अपनी संस्कारों को ना भूले यही हमारी असली पहचान होगी। समाज को सच्ची उन्नति के ओर ले जाएंगे।प्रभु का रास्ता बड़ा सीधा है और बड़ा उलझा भी बुद्धि से चलो तो बहुत उलझा और भक्ति से चलो तो बड़ा सीधा विचार से चलो तो बहुत दूर और भाव से चलो तो बहुत पास नजरो से देखो तो कण कण मे और अंतर्मन से देखो तो जन जन में।कण कण में है बस रहा जिसका अमित उजास काहे ढूंढे जगत में उनका मन में वास।श्रद्धा मस्तिष्क का विषय है भक्ति हृदय का विषय है और ध्यान दोंनों को जोड़ता है।
पालजीभाई राठोड़ ‘प्रेम’ सुरेंद्रनगर (रगुजरात)




