अंतरराष्ट्रीय अस्थिरता — विनोद कुमार शर्मा

अंतरराष्ट्रीय स्तर की बात जब हो तो पूरा का पूरा विश्व जिसकी कुल आबादी लगभग 820 करोड़ है भारतीय रीति नीति विश्व कुटुंबकम के हिसाब 195 देशों के समूह में समाई है
धर्म जातियों को छोड़ा जाए तो लगभग 7159 बोलियां वर्तमान उपयोग में
लाई जातीं हैं स्वाभाविक रूप से इतने बड़े विश्व परिवार में इतनी अधिक विभिन्नता तो थोड़ी बहुत खटपट होगी होती भी रहती सामान्य सी बात लेकिन इनके बीच आर्थिक तौर पर बहुत ही असामान्य स्थिति है विकसित विकासशील और गरीब देश l
लगभग पचास वर्षों से विश्व दो ध्रुवीय महाशक्तियों के संतुलनों से चलता कहने को तो संयुक्तराष्ट्र संघ विश्व का नेतृत्व करता लेकिन औपचारिकता ही निभाता अभी कुछ समय से सिर्फ एक ध्रुवीय शक्ति बनने बनाने के प्रयासों से विश्व को अशान्ति और खराब आर्थिक स्थितियों के लिए जुझना पड़ रहा
एक तरफ अरबों रुपये हथियारों और रक्षा बजट में जाती लेकिन गरीब देशों को कोई मदद नहीं मिल पाती देशों को आपस में लड़ने उकसाया जाता अपनी हथियारों की फैक्ट्रियों को दौलत कमाने का अवसर दिया जाता हमारा देश बहु ध्रुवीय शक्ति संतुलनों के पक्ष में रहा है
सोचिए 820 करोड़ मैं से 150 करोड़ आबादी के बाद भी हमें अभी तक संयुक्तराष्ट्र में स्थाई वीटो पावर नहीं मिला
और बहुत बड़ी आबादी युद्धों में फंसी इसका कारण शक्तियों को एक तरफ़ा खींचने के कुत्सित प्रयास और शान्ति के दुश्मनों की कुटिल चालें है l
विनोद कुमार शर्मा



